'दिल्ली में हर दिन सैकड़ों कुत्तों के काटने के मामले', अगर आप भी हैं इससे परेशान तो, जानें SC ने क्या कहा?
Supreme Court on Dog Bite: देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार, 28 जुलाई को एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए नई कार्यवाही शुरू की। यह मामला राजधानी दिल्ली में आवारा कुत्तों के हमलों और उसके परिणामस्वरूप बच्चों, नवजातों और बुजुर्गों की जान जाने से जुड़ा है।
दरअसल, राजधानी के पूठ कलां इलाके में छह साल की एक मासूम की 30 जून को कुत्ते के काटने के बाद इलाज के बावजूद मौत हो गई। इस दर्दनाक घटना को 28 जुलाई को Times of India के दिल्ली संस्करण में "City hounded by strays and kids pay price" शीर्षक से प्रकाशित किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी समेत देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए इसे बेहद गंभीर मामला बताया और मामले में तत्काल सुनवाई शुरू करने का फैसला लिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक बच्ची की मौत नहीं, बल्कि एक बड़ी सार्वजनिक चिंता का विषय है, जिस पर अब चुप नहीं बैठा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की दो सदस्यीय पीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए आदेश जारी किया कि, "सप्ताह की शुरुआत एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक खबर से होनी चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया की यह रिपोर्ट अविश्वसनीय रूप से खतरनाक आंकड़ों और तथ्यों को सामने लाती है। हर दिन सैकड़ों कुत्ते काटने के मामले सामने आते हैं, और रैबीज की वजह से मासूम बच्चों और बुजुर्गों की जान जा रही है। यह स्थिति बर्दाश्त नहीं की जा सकती।"
अदालत ने क्या निर्देश दिए?
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान याचिका (suo motu writ petition) के रूप में इस मामले को रजिस्ट्रार को दर्ज करने का आदेश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह मामला माननीय मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण आर. गवई के समक्ष आवश्यक निर्देशों के लिए प्रस्तुत किया जाए। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अब इस गंभीर समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बता दें कि 6 साल की छवि शर्मा को 30 जून को पूठ कलां में एक आवारा कुत्ते ने काट लिया था। प्रारंभिक इलाज के बाद भी उसे रैबीज का संक्रमण हो गया, और आखिरकार 26 जुलाई को उसकी मौत हो गई। यह मामला दिल्ली में सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्थानीय निकायों की लापरवाही को उजागर करता है।
पहले भी हुई थी सुनवाई: नोएडा में डॉग फीडिंग को लेकर चिंता
15 जुलाई को एक अलग पीठ - न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता - ने भी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर खाना खिलाने पर सवाल उठाए थे। नोएडा की निवासी रीमा शाह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर निर्दिष्ट फीडिंग स्पॉट्स की मांग की थी।
याचिका में 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें RWA और नगर निकायों को डॉग फीडिंग के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित करने को कहा गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट उस याचिका को खारिज करने की ओर था, लेकिन अंततः उसे इसी तरह के अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया गया।
समस्या सिर्फ कुत्तों की नहीं, कानून और व्यवस्था की भी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा "अब स्थिति यह हो गई है कि सड़कों पर इंसानों से ज्यादा जानवरों का अधिकार बढ़ गया है। क्या हमें हर सड़क पर एक अलग लेन बनानी पड़ेगी ताकि बड़े दिलवाले लोग आवारा कुत्तों और गायों को खाना खिला सकें?"
Animal Birth Control (ABC) Rules, 2023 के अनुसार: स्थानीय निकायों और RWA की जिम्मेदारी है कि वे समुदायिक कुत्तों को खाने और नसबंदी की सुविधा प्रदान करें। नियमों में यह भी कहा गया है कि मानव सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। हालांकि, इन नियमों को लागू करने में स्थानीय प्रशासन अक्सर असफल रहता है। दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों की समस्या अब जानलेवा स्तर पर पहुंच चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह स्वतः संज्ञान इस बात का संकेत है कि अब सिर्फ सामाजिक भावना या पशु प्रेम के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता, बल्कि एक ठोस नीति और प्रशासनिक जवाबदेही की जरूरत है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश इस मामले पर क्या अगला कदम उठाते हैं।












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