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Delhi Rain Basera: कड़ाके की सर्दी में दिल्ली का सहारा बने रैन बसेरे, तीन वक्त का खाना और सुरक्षित छत

Delhi Rain Basera: दिल्ली की सर्दी और ठिठुरती रातें, बेसहारा लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती थी, अगर सरकार ने समय रहते मोर्चा न संभाला होता। जब तापमान तेजी से गिर रहा है और ठंडी हवाएं रात को और बेरहम बना रही हैं, तब राजधानी के रैन बसेरा हजारों बेसहारा लोगों के लिए उम्मीद की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरे हैं।

सड़कों, फुटपाथों और अस्पतालों के बाहर रात गुजारने को मजबूर लोगों के लिए ये रैन बसेरे सिर्फ छत नहीं, बल्कि इंसानियत का एहसास हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार ने इस बार विंटर एक्शन प्लान को पूरी गंभीरता के साथ लागू किया है। सरकार का साफ संदेश है कि कड़ाके की ठंड में कोई भी जरूरतमंद परेशान न हो।

Delhi Rain Basera

इसी सोच के तहत राजधानी में 197 स्थायी रैन बसेरे पहले से मौजूद हैं, जिनमें करीब 18 हजार लोगों के ठहरने की व्यवस्था है। इसके अलावा 250 अस्थायी रैन बसेरों की योजना बनाई गई, जिनमें से 204 पूरी तरह तैयार हो चुके हैं।

सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि अस्पतालों में मरीजों को कंबलों की कमी न हो और स्कूलों में बच्चों को ठंड से बचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जाएं। रैन बसेरों की निगरानी 15 मार्च 2026 तक लगातार की जाएगी, ताकि सर्दी के पूरे मौसम में व्यवस्था बनी रहे।

अस्पतालों के पास रैन बसेरे, मरीजों के परिजनों को बड़ी राहत

दिल्ली के बड़े अस्पतालों के आसपास बने रैन बसेरे सर्दी में किसी वरदान से कम नहीं हैं। एम्स, सफदरजंग अस्पताल, गुरु तेग बहादुर अस्पताल, दिलशाद गार्डन और IHBAS जैसे संस्थानों के पास बने रैन बसेरों में रोज सैकड़ों लोग ठहरते हैं। इनमें दिल्ली ही नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों से इलाज के लिए आए मरीजों के परिजन भी शामिल हैं।

इन लोगों के लिए यह सिर्फ ठहरने की जगह नहीं, बल्कि चिंता से भरे दिनों में थोड़ी राहत का ठिकाना है। अस्पताल की लंबी कतारों और अनिश्चित इलाज के बीच रात को सुरक्षित छत और गर्म कंबल मिलना, उनके लिए बहुत बड़ी मदद है।

रैन बसेरों के भीतर की कहानी, सुविधा के साथ कुछ शिकायतें भी

वनइंडिया हिंदी की टीम ने जब रैन बसेरों में रह रहे लोगों से बात की, तो ज्यादातर ने सरकार की व्यवस्था की तारीफ की। लोगों ने बताया कि उन्हें दो कंबल, गद्दा, चादर, गर्म पानी और दिन में तीन वक्त का खाना मिल रहा है। चाय की व्यवस्था भी है, जो ठंड में खास राहत देती है।

हालांकि कुछ लोगों ने यह भी कहा कि खाने की गुणवत्ता ठीक है, लेकिन मात्रा थोड़ी कम पड़ जाती है। उनका कहना है कि सरकार अगर भोजन की मात्रा बढ़ा दे, तो यह व्यवस्था और बेहतर हो सकती है। इसके बावजूद, ज्यादातर लोगों ने माना कि खुले आसमान के नीचे ठिठुरने से बेहतर है कि उन्हें यहां सुरक्षित और गर्म माहौल मिल रहा है।

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केयरटेकर बोले, सर्दी में बढ़ जाती है जिम्मेदारी

रैन बसेरों के केयरटेकरों का कहना है कि सर्दी शुरू होते ही सरकार की ओर से निर्देश मिल जाते हैं। साफ सफाई, टॉयलेट, कंबल, गद्दे, पीने का पानी और सुरक्षा पर खास ध्यान दिया जाता है। ठंड बढ़ने के साथ ही अतिरिक्त कंबल और हीटर जैसी व्यवस्थाएं भी की जाती हैं, ताकि कोई बीमार न पड़े।

उनका कहना है कि कई लोग पहली बार रैन बसेरे में आते हैं और शुरुआत में झिझकते हैं, लेकिन एक दो दिन में ही उन्हें यहां का माहौल अपनापन देने लगता है।

बंद मोहल्ला क्लीनिक बनेंगे रैन बसेरे, नई योजना पर काम

दिल्ली सरकार अब रैन बसेरों की संख्या और बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार ने बंद हो चुके मोहल्ला क्लीनिकों के पोर्टा कैबिन्स को नाइट शेल्टर में बदलने की योजना बनाई है। जानकारी के मुताबिक, अब तक 247 मोहल्ला क्लीनिक बंद किए जा चुके हैं।

दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड को इन पोर्टा कैबिन्स की स्थिति का आकलन करने के निर्देश दिए गए हैं। जहां संभव होगा, वहां इन्हें रैन बसेरों में बदला जाएगा। एक अधिकारी के अनुसार, एक क्लीनिक को शेल्टर होम में बदलने पर करीब 10 लाख रुपये का एकमुश्त खर्च आएगा। इसके बाद हर महीने करीब 1 लाख रुपये रखरखाव और संचालन पर खर्च होंगे।

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सर्द रातों में सरकार की पहल बनी जीवन रेखा

दिल्ली की ठंडी रातों में जब सड़कें सुनसान हो जाती हैं, तब रैन बसेरों की रोशनी हजारों जिंदगियों के लिए सुकून बनती है। यह पहल सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए सहारा है, जिनके पास सर्दी से लड़ने का कोई साधन नहीं। ठंड से बचाने की यह कोशिश इंसानियत को जिंदा रखने की एक मजबूत मिसाल है।

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