बंदरों को खाना खिलाने की आदत बदलिए, इससे क्या फायदा? जानें दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा

Delhi News: आप अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसी रील्स देखते होंगे, जिसमें लोग बंदरों को खाना खिलाते हुए दिखाई देते हैं। लोग ऐसे वीडियो को काफी पसंद भी करते हैं इस कारण बंदरों को खाना खिलाते हुए वीडियो बनाने वालों की बाढ़ आ गई है। इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट की एक टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है,जो वन्य जीव और मानव के बीच जरूरी दूरियों को व्यक्त करती है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान बंदरों को खाना खिलाने के खतरों पर चिंता वक्त की है। कोर्ट ने कहा कि इससे बंदरों की मनुष्यों पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसा करने से वन्य जीवों और मनुष्यों के बीच प्राकृतिक दूरी कम हो जाती है। कोर्ट ने सिविक एजेंसियों को लोगों को जागरूक करने के निर्देश भी दिए हैं। पीठ ने कहा कि भोजन वन्य जीवों को कई तरीकों से नुकसान पहुंचाता है।

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दरअसल देश की राजधानी में बंदराें की बढ़ती समस्या को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविक एजेंसियों से कहा है कि उन्हें लोगों को यह बताने की अवश्यकता है कि कैसे उनके द्वारा खाना खिलाने से बंदरों को कोई लाभ नहीं हो रहा है।

मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि भोजन जानवरों को कई प्रकार से नुकसान पहुंचाता है। इससे उनकी मनुष्यों पर निर्भरता बढ़ती है और जंगली जानवरों और मनुष्यों के बीच कुदरती दूरी कम हो जाती है।

मुख्य पीठ ने कहा कि कोर्ट मानती है कि दिल्ली के लोगों को यदि एहसास होगा कि जंगली जानवरों को खाना खिलाना जानवरों के कल्याण के साथ ही मानव कल्याण के लिए हानिकारक है,तो वह अपना व्यवहार बदल देंगे।

पीठ ने कहा कि सिविक एजेंसियों को दिल्ली के लोगों को यह बताने के लिए निरंतर एक जागरुकता अभियान चलाना चाहिए कि उनके भोजन से बंदरों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। कचरा प्रबंधन पर पीठ ने कहा कि सार्वजनिक पार्कों, फूड हब, ढाबा और कैंटीन आदि में खुले में फैला कूड़ा बंदरों की भीड़ को आकर्षित करता है।

पीठ ने कहा कि यदि दिल्ली के नागरिक सुरक्षित वातावरण में रहना चाहते हैं, तो इनको अपने आसपास कूड़ा नहीं फैलाना चाहिए। इस पहलू को भी जन जागरूकता अभियान में उजागर करने की अवश्यकता है। उक्त टिप्पणी के साथ कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) को राष्ट्रीय राजधानी में बंदरों के खतरे से निपटने के लिए एक कार्यक्रम बनाकर उसे लागू करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने उक्त निर्देश साल 2015 में 2 गैर सरकारी संगठनों- न्याय भूमि और द सोसाइटी फॉर पब्लिक काज द्वारा इस विषय से संबंधित दायर की गई 2 जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। प्रकरण में अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को होगी।

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