Mahasamund: गोठान में निर्मित गोबर पेंट से शुरू हुई सरकारी भवनों की पुताई

Gobar Paint: गोबर पेंट की क़ीमत बाजार में उपलब्ध रासायनिक पेंट से कम है, साथ ही गोबर से निर्मित होने के कारण रासायनिक पेंट की तुलना में इसमें महक भी नहीं आती है।

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Gobar Paint: मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देशों के अनुरूप महासमुंद स्थानीय गोठानों में निर्मित गोबर पेंट से सरकारी भवनों की पुताई का काम लगातार शुरू है। महासमुंद के बिरकोनी गौठान में महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगिक पार्क रिपा अंतर्गत स्थापित गोबर से डिस्टेंपर पेंट बनाने का काम चल रहा है। पहले सिरपुर - बांसकुड़ा में शासकीय उचित मूल्य और आँगनवाडी केंद्र में पुताई गोबर पेंट से की जा चुकी है।

पिछले माह छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के बांसकुड़ा आगमन पर इसकी काफ़ी सराहना हुई। अब लोक निर्माण द्वारा निर्मित महासमुंद के बाल संप्रेक्षण गृह के अहाता का गोबर डिस्टेम्पर पेंट से किया जा रहा है।

लोक निर्माण के कार्यपालन अभियंता एस.आर.चंद्राकर ने बताया कि इसमें लगभग 200 लीटर गोबर पेंट लगेगा। गोबर पेंट की बाज़ार क़ीमत 160 रुपये प्रति लीटर है। कुल क़ीमत 32000 होगी। ज़िले के नवीन निर्मित निर्माण में अब गोबर पेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने हाल ही में रिपा को 1000 लीटर गोबर पेंट का ऑर्डर दिया है।

गोबर पेंट की क़ीमत बाजार में उपलब्ध रासायनिक पेंट से कम है, साथ ही गोबर से निर्मित होने के कारण रासायनिक पेंट की तुलना में इसमें महक भी नहीं आती है। गांवो के गोठान में संचालित रिपा में महिला समूहों द्वारा तैयार किया गया गोबर पेंट अब मल्टी नेशनल कंपनियों के पेंट को टक्कर दे रहा है। पेंट निर्माण में मल्टी नेशनल कंपनियां के पेंट बाजार में देखने को मिलते है। लेकिन अब ग्रामीण महिलाएं भी गोबर पेंट का उत्पादन कर मजबूती से कदम रख रही हैं।

जिले में संचालित बिरकोनी गोठानों में रिपा में समूह की महिलाओं द्वारा अब तक लगभग 4000 लीटर पेंट तैयार कर लिया गया है। जिसमें से एक लाख 44 हजार रुपए का पेंट विक्रय कर लिया गया है। गोबर पेंट से ही महिलाओं को 28 हजार 900 रुपए की आय हुई है। पेंट कार्य से जुड़ी श्रीमती चितरेखा, रामकली यादव, खिलेश्वरी साहू ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा प्रोत्साहित करने के कारण गोबर पेंट बनाने का कार्य जारी है। विभिन्न विभागों से लगातार ऑर्डर भी प्राप्त हो रहा है। गोबर पेंट वास्तव में आजीविका का एक नए साधन के रूप में हमें रोजगार प्रदान कर रहा है। इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है अपितु यह पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी फायदेमंद है।

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