छत्तीसगढ़ सरकार,राजभवन और कानूनी पचड़े में फंसकर रह गया आरक्षण, विधानसभा चुनाव तक होगा बहाल ?
राज्यपाल अनुसईया उईके ने भूपेश बघेल सरकार को 10 सवालों की एक सूची भेजी है। इसमें पूछा गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा मानने का आधार क्या है।
छत्तीसगढ़ देश में एक मात्र ऐसा राज्य बन चुका है,जहां जातिगत आरक्षण का लाभ शून्य हो चुका है। इस बात के आसार कम ही नजर आ रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इस स्थिति में सुधार हो पाए। विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित हुए आरक्षण संशोधन विधेयक पर राज्यपाल के दस्तखत नहीं हो सके हैं। राजभवन की तरफ से सरकार से आरक्षण विधेयक के संबंध में 10 सवाल पूछे गए हैं। अब सरकार ,सत्ता संगठन और राजभवन में बीच टकराव के बीच आरक्षण का पेंच क़ानूनी उलझनों में बुरी तरफ फंसकर रह गया है।

राज्यपाल ने पूछे सवाल, फंस गया पेंच
आरक्षण संशोधन विधेयकों पर छत्तीसगढ़ सरकार में असमंजस कायम है। 14 दिन बाद भी आरक्षण संशोधन विधेयकों पर राज्यपाल अनुसईया उईके ने ना तो हस्ताक्षर किये हैं और ना ही उसे सरकार को लौटाया है,बल्कि राजभवन ने भूपेश बघेल सरकार को 10 सवालों की एक सूची भेजी है। इसमें पूछा गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा मानने का आधार क्या है। अपने सवालों के माध्यम से राजभवन ने कुछ जरूरी कानूनी सवाल उठाये हैं।

डाटा कहाँ से लाएगी सरकार
बताया जा रहा है कि राजभवन ने सवाल किया है कि आरक्षण विधेयक को पारित करने से पूर्व अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का कोई डाटा जुटाया गया था या नहीं? अगर जुटाया गया था तो उसका विवरण पेश होना चाहिए। 1992 में आये इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने आरक्षित वर्गों के लिए आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा करने के लिए विशेष और बाध्यकारी परिस्थितियों की शर्त लगाई थी। उस विशेष और बाध्यकारी परिस्थितियों से जुड़ा विवरण क्या है?
राजभवन ने सरकार से जानना चाहा है कि मंत्रिमंडल के सामने आरक्षण पर चर्चा के दौरान तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण का उदाहरण रखा गया था। इन राज्यों ने आरक्षण बढ़ाने से पूर्व आयोग का गठन करके परीक्षण कराया था, तो क्या छत्तीसगढ़ ने भी ऐसे प्रयास हुए थे,अगर हुए थे,तो उसकी रिपोर्ट पेश की जानी चाहिए।

सरकार और राजभवन में बीच मतभेद बढ़ें
इस स्थित पर राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि राज्यपाल ने पूर्व में कहा था कि मैं विधेयक पर तुरंत हस्ताक्षर करूंगी,लेकिन अब वह किंतु-परंतु कर रही हैं, इसका अर्थ है कि वह चाहती थी,लेकिन बीजेपी वालों ने दबाव बना कर रखा है। भाजपा आरक्षण के विरोधी हैं।
वहीं प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने आरक्षण मामले पर कहा कि न्यायलय के फैसले के बाद 15 अक्टूबर को राजभवन पैदल मार्च कर आरक्षण की बहाली की मांग करने वाले भाजपा के नेता अब जब आरक्षण विधेयक में हस्ताक्षर नहीं होने के चलते बहाली में हो रही देरी पर राजभवन जाने से क्यों डर रहे हैं? आखिर भाजपा नेताओं को आरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर होने से डर क्यों सता रहा है? धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि छत्तीसगढ़ ही नहीं और कई प्रदेश है जहां आरक्षण 50 प्रतिशत से ऊपर है।

भाजपा के आरोप,बनान तैयारी के लाया गया था विधेयक
इधर पूर्व नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा कि आरक्षण का लाभ जनता को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कारण से ही नहीं मिल पा रहा है। छत्तीसगढ़ में जब भाजपा की सरकार की थी,तब 32 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया था,जिसका लाभ लोगो को मिल रहा था, लेकिन कांग्रेस से जुड़े लोगों को ही कोर्ट भेजकर आरक्षण पर रोक लगवाई गई। कांग्रेस आरक्षण विरोधी है,इसलिए आनन फानन में विधानसभा में बिना तैयारी के बिल लाया गया।

तो क्या फंस गये आरक्षण विधेयक?
अब सवाल उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ में आरक्षण विधेयक उलझ गये है? इसपर विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव देवेंद्र वर्मा ने अपने एक कथन में कहा है कि यह विधेयक शुरू से ही फंसे हुए थे,क्योंकि आरक्षण में अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत का निर्धारण उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी(मंडल कमीशन) मुकदमा में किया है। इससे पहले महाराष्ट्र में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक करने पर महाराष्ट्र के कानून को हाईकोर्ट निरस्त कर चुका है। अभी भी तमिलनाडु, हरियाणा और कर्नाटक की 50 प्रतिशत की सीमा को परीक्षण करने सम्बन्धी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लम्बित हैं।
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