Chhattisgarh Assembly Election: नारायणपुर में कांग्रेस का दबदबा, क्या भाजपा अपने पुराने गौरव को ले पाएगी वापस?
Chhattisgarh Assembly Election: बस्तर संभाग की 12 विधानसभा सीटों में से एक नारायणपुर विधानसभा में इस बार एक पूर्व मंत्री और एक राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त विधायक के बीच की चुनावी दंगल छिड़ा हुआ है। इस चुनावी दंगल में भाजपा ने पूर्व मंत्री केदार कश्यप को चौथी बार मैदान में उतारा है।
वहीं कांग्रेस ने वर्तमान विधायक और हस्तशिल्प बोर्ड के अध्यक्ष चंदन कश्यप को तीसरी बार टिकट दिया है। यहां दोनों के बीच सीधी टक्कर होने की संभावना दिख रही है।

नारायणपुर जिले में नारायणपुर एकमात्र विधानसभा है। यहां से भाजपा के केदार कश्यप दो बार विधायक रहे, जो साल 2008 और 2013 में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व विधानसभा में करते रहे।
इन्हीं दो कार्यकालों में केदार प्रदेश के मंत्रिमंडल के सदस्य भी रहे। वहीं तीसरी बार चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के चंदन कश्यप साल 2013 में चुनाव हार चुके हैं और 2018 में वे विधायक चुने गए।
2018 में विधायक बनने के बाद चंदन पर कार्यकर्ताओं ने उनकी अनदेखी करने का आरोप लगाया है। विधायक बनने के बाद कार्यकर्ताओं की अनदेखी के बाद एक-एक कर कार्यकर्ता उनसे कटते चले गए हैं। कार्यकर्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जिनके लिए पूरे चुनाव में दिन-रात एक कर दिया, उन्हीं कार्यकर्ताओं के काम विधायक ने नहीं करवाए हैं। ऐसे में कार्यकर्ताओं में विधायक चंदन कश्यप के प्रति नाराजगी देखने को मिल रही है।
दूसरी तरफ भाजपा के प्रत्याशी केदार कश्यप चौथी बार चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन यहां भाजपा की स्थिति कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की नाराजगी के कारण मजबूत होती दिख रही है। दूसरी तरफ बीते महीनों नारायणपुर जिला मुख्यालय में धर्मांतरण को लेकर आदिवासियों के विद्रोह के चलते भी कांग्रेस को नुकसान होने के आसार बढ़ गए हैं। भाजपा लगातार धर्मांतरण के मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करती रही है, वहीं वर्तमान विधायक चंदन कश्यप पर धर्मांतरण को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं।
छत्तीसगढ़ गठन के बाद साल 2003 में पहली बार हुए विधानसभा चुनाव में नारायणपुर सीट से भाजपा के विक्रम उसेंडी ने कांग्रेस के मंतुराम पवार को हराया था। इसके बाद 2008 में हुए चुनाव में भाजपा के केदार कश्यप ने कांग्रेस के रजनूराम नेताम को करीब 21 हजार वोटों से और साल 2013 में वर्तमान विधायक चंदन कश्यप को करीब 12 हजार वोटों से पटखनी दी थी। इसके बाद 2018 में हुए चुनाव में भाजपा के केदार कश्यप के प्रति एंटी इंकम्बेंसी देखने को मिली और चंदन ने करीब 2 हजार वोटों की बढ़त लेकर केदार को हरा दिया था।
2003 से लेकर 2018 तक 15 सालों तक नारायणपुर सीट पर भाजपा का कब्जा था, लेकिन 2018 में चली भाजपा विरोधी लहर में जहां प्रदेश से भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया और करीब 15 सीटों पर भाजपा सिमट गई, इसमें नारायणपुर की सीट भी खासी प्रभावित हुई। हालांकि हार का अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन भाजपा विरोधी लहर में कांग्रेस के चंदन कश्यप विधायक बन गए।
अब फिर से नारायणपुर सीट पर कांग्रेस के प्रति एंटी इंकम्बेंसी देखने को मिल रही है। इसके चलते इसका सीधा फायदा भाजपा को होता दिख रहा है। दरअसल नारायणपुर जिले में दो ब्लॉक आते हैं, जिनमें एक नारायणपुर और दूसरा ओरछा ब्लॉक है। ओरछा ब्लॉक अबूझमाड़ का इलाका माना जाता है, जहां करीब 98 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है।
इस बार आदिवासियों में जिस तरह से धर्मांतरण का विरोध दिखा है, वहीं भाजपा ने भी धर्मांतरण के इस मुद्दे को हाथोंहाथ लेकर इसे हवा दी। यही कारण है कि धर्मांतरण के खिलाफ अपनी बात रखने के चलते नारायणपुर सीट पर आदिवासियों का समर्थन भाजपा के साथ दिख रहा है। कुल मिलाकर नारायणपुर सीट पर भाजपा की स्थिति बेहद मजबूत दिख रही है, लेकिन इसका फैसला 3 दिसंबर को होने वाली मतगणना के बाद ही हो पाएगा।
बहरहाल भाजपा से केदार कश्यप और कांग्रेस से चंदन कश्यप के अलावा नारायणपुर सीट से बहुजन समाज पार्टी से आयतुराम मंडावी, आम आदमी पार्टी से नरेंद्र नाग, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जोगी से बलीराम कचलाम, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से फूलसिंह कचलाम, फॉरवर्ड डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी से रामसाय दुग्गा, राष्ट्रीय जनसभा पार्टी से रामूराम उसेंडी और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सुखलाल करंगा चुनावी मैदान में हैं।
संवाद सूत्र: ऋषि भटनागर, जगदलपुर/छत्तीसगढ़









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