Indian Rupee Fall: बांग्लादेशी टका और अफगानी करेंसी के सामने भी पस्त हुआ भारतीय रुपया, देखें 5 साल के आंकड़े
Indian Rupee Vs Neighboring Countries Currency: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये लगातार गिरता जा रहा हैं। फिलहाल 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 95.33 रुपये पहुंच गई है। इसका असर सिर्फ डॉलर तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के कुछ पड़ोसी देशों की मुद्राएं भी रुपये के मुकाबले मजबूत हुई हैं।
पिछले पांच वर्षों में अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसी अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी ने भी भारतीय रुपये के मुकाबले बढ़त दर्ज की है। इस रिपोर्ट में पिछले 5 साल के आकड़े देखते हैं कैसे भारतीय करेंसी के मुकाबले केवल डॉलर ही नहीं बल्कि पड़ोसी देश जो जिसका इकॉनोमी हमारे देश के मुकाबले बहुत छोटी है उनका भा करेंसी मजबूत हुआ है।

5 साल में लगभग दोगुनी हुई अफगानिस्तान की करेंसी
| वर्ष | 1 अफगानी करेंसी के बराबर कितने रुपए |
| 2022 | लगभग ₹0.88 |
| 2023 | लगभग ₹1.01 |
| 2024 | ₹1.19 |
| 2025 | लगभग ₹1.25 |
| 2026 | लगभग ₹1.46-₹1.49 |
इस आकड़े को देखने के बाद पता चलता है कि, जहां 2022 में 1 अफगान अफगानी की कीमत 1 रुपये से भी कम थी, वहीं अब इसकी कीमत करीब 1.47 रुपये के आसपास पहुंच गई है। यानी भारतीय रुपये के मुकाबले अफगान अफगानी की विनिमय दर में भारी बढ़ोतरी दर्ज हुई है।
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बांग्लादेश की करेंसी भी हुई मजबूत
| वर्ष | रुपए के मुकाबले 1 बांग्लादेशी टका की कीमत |
| 2021 | लगभग ₹0.69-0.70 |
| 2022 | लगभग ₹0.71-0.72 |
| 2023 | लगभग ₹0.74-0.75 |
| 2024 | लगभग ₹0.75-0.76 |
| 2025 | लगभग ₹0.76-0.77 |
| 2026 | लगभग ₹0.77-0.79 |
इस आकड़े से ये स्पष्ट होता है कि, बांग्लादेशी टका भारतीय रुपए के मुकाबले मजबूत हुआ है। जहां पांच साल पहले 70 पैसे के बराबर 1 बांग्लादेशी टका होता था। वहीं अब इसकी कीमत करीब 77-79 पैसे के आसपास पहुंच गई है। यानी भारतीय रुपये के मुकाबले बांग्लादेशी टका मजबूत हुआ है।
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भारतीय रुपये के मुकाबले पड़ोसी देशों की करेंसी
- 1 पाकिस्तानी रुपया: = ₹0.30
- 1 नेपाली रुपया: = ₹0.63
- 1 भूटानी नगुलट्रम: = ₹1.00
- 1 चीनी युआन: ₹11.40-₹11.60
- 1 म्यांमार क्यात: = ₹0.045-₹0.05
- 1 अफगान अफगानी: = ₹1.47
- 1 बांग्लादेशी टका: = ₹0.78
क्यों लगातार कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया?
भारतीय रुपये के लगातार कमजोर होने के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण हैं। सबसे बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर की मजबूती है। जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशक डॉलर में निवेश करना पसंद करते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इसके अलावा भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। तेल की कीमत बढ़ने पर ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजार से पैसा निकालने, बढ़ते व्यापार घाटे और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का भी रुपये पर असर पड़ता है। हालांकि कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है, लेकिन इससे आईटी, फार्मा और अन्य निर्यातक कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी मिल सकता है।












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