आजादी के 77 साल: 1947 में 3.30 रुपए में मिल जाता था 1 डॉलर, जानें कैसे कमजोर हुई भारतीय मुद्रा
Independence Day 2024: अमेरिकी डॉलर (USD) दुनिया की सबसे शक्तिशाली मुद्राओं में से एक है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर सबसे ज़्यादा कारोबार में उपयोग की जाने वाली मुद्रा भी है। अगर भारत या कोई अन्य देश अपनी मुद्रा की मजबूती या कमजोरी जांचता है तो उसका बेंचमार्क अमेरिकी डॉलर होता है।
आजादी के 77 साल बाद आज, अगर हम एक अमेरिकी डॉलर की तुलना भारतीय रुपए से करें तो वह बहुत कम है। आज के दिन में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 83.95 रुपए है। भारत इस साल अपना 78वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आज से 78 साल पहले भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना इतना कमजोर नहीं था।

कभी आते थे 13 रुपए में 4 डॉलर
जब से देश ब्रिटिश राज के चंगुल से मुक्त हुआ है, तब से भारतीय मुद्रा - रुपया - का अवमूल्यन हो रहा है। कभी 13 रुपये में एक पाउंड स्टर्लिंग या 4 अमेरिकी डॉलर खरीदा जा सकता था। लेकिन अब लगभग 84 रुपये से 1 अमेरिकी डॉलर खरीद सकते हैं। 1947 के बाद से भारतीय मुद्रा लगातार कमजोर हुई है।
20 बार हो चुका है रुपए का अवमूल्यन-
स्वतंत्रता के बाद से, रुपये का अवमूल्यन लगभग 20 बार हुआ है। पिछले 75 वर्षों में रुपये की कमज़ोरी के कई कारण रहे हैं। जिसमें व्यापार घाटा भी है। जो बढ़कर 31 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है, जबकि स्वतंत्रता के समय व्यापार घाटा लगभग शून्य था। इसका बड़ी मात्रा में तेल का आयात।
रुपए की कमजोरी के पीछे ये है कारण
जब देश आजाद हुआ था, तब एक डॉलर की कीमत 3 रुपए 30 पैसे थी। 1947 के बाद से ही मैक्रोइकॉनोमिक मोर्चे पर बहुत कुछ हुआ है। जिसमें 1960 के दशक में खाद्य और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के कारण पैदा हुआ आर्थिक तनाव भी शामिल है। फिर भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के चलते भी भारी कीमत चुकानी पड़ी। एक समय ऐसा भी आया जब 1966 में भारत दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया, भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो गया था।
1991 का आर्थिक संकट
तत्कालीन इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को रुपये का भारी अवमूल्यन करना पड़ा। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य ₹4.76 से गिरकर ₹7.5 हो गया। एक बार फिर 1991 में, भारत एक गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया, क्योंकि देश के पास अपने आयातों का भुगतान करने और अपने बाहरी ऋण दायित्वों को पूरा असमर्थ था। भारत डिफ़ॉल्ट के कगार पर था,। जिसके लिए बहुत जरूरी सुधारों की आवश्यकता थी। इसके बाद देश की अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया के लिए खोल दिया गया।
संकट को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने दो तीव्र चरणों (क्रमशः 9 प्रतिशत और 11 प्रतिशत) में रुपये का अवमूल्यन किया । अवमूल्यन के बाद, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य लगभग 26 पर पहुंच गया। पिछले 75 वर्षों में रुपये में ₹75 से अधिक की गिरावट आई है।
2008 की मंदी
वर्ष 2000 से 2007 के बीच रुपया देश में आने वाले पर्याप्त विदेशी निवेश के कारण कुछ हद तक स्थिर रहा, लेकिन बाद में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान इसमें गिरावट आई। 2009 से इसमें बड़ी गिरावट शुरू हुई, जो 46.5 से शुरू होकर अब करीब 84 रुपए तक पहुंच गई है।
2013 में मूल्यह्रास
22 मई, 2013 में 1 डॉलर की कीमत 55.48 रुपए थी। लेकिन पंद्रह दिनों के भीतर यह गिरकर 57.07 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गई। इस बदलाव के पीछे का कारण आयात में डॉलर की मांग में वृद्धि और FII द्वारा ऋण बाजार से पूंजी का निकालना था, जिसके परिणामस्वरूप रुपये के मूल्य में गिरावट आई।
2016 की नोटबंदी
2016 में वर्तमान भारतीय सरकार ने पुराने नोटों को हटाने और उन्हें नए नोटो से बदलने का फैसला किया था। इस कदम ने भी रुपए की कीमतों को अधिक गिरा दिया। नोटबंदी के समय रुपए की कीमत करीब 67 रुपए थे। जिसके बाद रुपया गिर 71 के स्तर पर पहुंच गया।
डॉलर बनाम रुपया इतिहास
1944 में ब्रिटन वुड्स समझौता पारित हुआ था। इस समझौते ने दुनिया की हर मुद्रा का मूल्य निर्धारित किया। भारत के आज़ाद होने के समय तक हर कोई धीरे-धीरे इसके साथ तालमेल बिठा रहा था। 1947 में आज़ादी के बाद से, INR का मूल्य लगातार कम होता गया है।












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