अजीत पई: वो भारतीय जिसे 'इंटरनेट का खलनायक' माना जाता है

अजीत पई
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'द मोस्ट हेटेड पर्सन ऑन द इंटरनेट', यूट्यूब पर अजीत पई को लेकर जारी किए गए वीडियो का कुछ ऐसा ही टाइटल था.

अमरीका के फ़ेडरल कम्यूनिकेशन कमिशन (एफ़सीसी) के चीफ़ अजीत पई को बहुत से लोग 'इंटरनेट के खलनायक' के तौर पर देखते हैं. एफ़सीसी का कामकाज तक़रीबन भारत के दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ट्राई (TRAI) जैसा ही है. अमरीका में नेट न्यूट्रैलिटी से जुड़े एक क़ानून को रद्द करने का फ़ैसला किया गया है.

इंटरनेट पर नेट न्यूट्रैलिटी की गारंटी देने वाले इस अमरीकी क़ानून को खत्म करने के पक्ष में अजीत पई के वोट देने से दो हफ्ते पहले ये वीडियो स्वीडिश प्रोड्यूसर और विवादास्पद व्यंग्यकार ने यूट्यूब पर जारी किया था. दो हफ्ते में इस वीडियो को तीस लाख से भी ज़्यादा बार देखा जा चुका है.

अजीत पई का वोट इस लिहाज से निर्णायक था क्योंकि इससे नेट न्यूट्रैलिटी के पैरोकार तीन मतों के मुक़ाबले दो पर रह गए.

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कौन हैं अजीत पई?

राष्ट्रपति ट्रंप ने जनवरी, 2017 में सरकार में आने के बाद अजीत पई की एफ़सीसी चीफ़ के पद पर नियुक्ति की थी. डेमोक्रेट राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौर में भी अजीत पई ने कभी भी नेट न्यूट्रैलिटी की गारंटी देने वाले क़ानून के प्रति अपना विरोध छुपाया नहीं था. वे रिपब्लिकन पार्टी के लिए रुझान रखते हैं.

ओबामा के वक्त गठित किए गए एक आयोग ने नेट न्यूट्रैलिटी की गारंटी देने वाले नियमों को मंजूरी दी थी. इससे भी दिलचस्प बात ये है कि ओबामा प्रशासन ने ही रिपब्लिकन पार्टी के एक नेता मिक मैकोनेल की सिफ़ारिश पर अजीत पई की एफ़सीसी मेंबर के तौर पर नियुक्ति की थी.

आप्रवासी भारतीय परिवार में पैदा हुए अजीत पई ने शिकागो यूनिवर्सिटी से क़ानून और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई की है. 44 साल के अजीत पई का करियर अमरीकी सरकार और कॉरपोरेट वर्ल्ड दोनों में ही शानदार रहा है, ख़ासकर दूरसंचार के क्षेत्र में.

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बड़ी ज़िम्मेदारियां संभाल चुके हैं

फ़रवरी, 2001 में बहुराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनी वेरीज़ोन में उन्होंने एसोसिएट जनरल काउंसल की ज़िम्मेदारी मिली तो 2003 में अमरीकी सीनेट के ज्यूडीशियल कमेटी के उपमुख्य सलाहकार बना दिया गया. फ़ेडरल कम्यूनिकेशन कमीशन में जाने से पहले अजीत पई अमरीकी न्याय विभाग में कई ज़िम्मेदारियां संभाल चुके थे.

इंटरनेट पर लगाई जाने वाली पाबंदियों की अजीत पई ने हमेशा से मुख़ालफत की. कारोबार में सरकार की कम से कम दखलंदाज़ी हो- पई ने हमेशा से इसका पक्ष लिया है. क़ानून और कम्यूनिकेशन के मुद्दों पर इस शख़्स की जबरदस्त पकड़ मानी जाती है. एफ़सीसी में पई की नियुक्ति का प्रतिष्ठित फ़ोर्ब्स पत्रिका ने भी स्वागत किया था.

जनवरी, 2017 में फ़ोर्ब्स ने उनके बारे में लिखा कि पई ने टेक्नोलॉजी और कम्यूनिकेशन के मुद्दे पर काम करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया है. वे चाहते तो क़ानून के पेशे में उनका असाधारण करियर होता. एफ़सीसी में उनके नेतृत्व को तब सिलिकॉन वैली और इंटरनेट कंपनियों के लिए बहुत अच्छी ख़बर बताया गया था.

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ऐसा नहीं है कि हर कोई अजीत पई का समर्थन ही कर रहे हैं. अजीत पई के विरोधी रिपब्लिकन पार्टी के आला ओहदेदारों और वेरिज़ोन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उनके जुड़ाव पर सवाल उठाते हैं. क्रेग एरोन डिजिटल अधिकारों की वकालत करने वाले संगठन 'फ़्री प्रेस' के अध्यक्ष हैं.

वे कहते हैं, "वे प्राइवेट सेक्टर में जिन कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं, वे उन्हीं के हितों को तवज्जो दे रहे हैं. सभी विचारधाराओं के लाखों अमरीकी लोग अपने अधिकारों के लिए एफ़सीसी पर निर्भर हैं."

क्या है इंटरनेट न्यूट्रैलिटी?

इंटरनेट यूज़र्स के लिए समान स्पीड और समान कीमत पर इंटरनेट उपलब्ध रहने का विचार ही इंटरनेट न्यूट्रैलिटी यानी इंटरनेट तटस्थता है. इसे आप इस तरह समझ सकते हैं. मसलन, वॉट्सऐप के डेटा पैक की कीमत 65 रुपये और ट्विटर वाले डेटा पैक की कीमत 250 रुपये हो.

जबकि दोनों मोबाइल ऐप के इस्तेमाल के लिए आपको एक ही इंटरनेट की जरूरत होती है. ऐसे में कंपनियां इंटरनेट की उपलब्धता को कीमत से प्रभावित करके आपके चुनने की शक्ति को प्रभावित कर सकती हैं.

दरअसल, नेट न्यूट्रैलिटी (इंटरनेट तटस्थता) वो सिद्धांत है जिसके तहत माना जाता है कि इंटरनेट सर्विस प्रदान करने वाली कंपनियां इंटरनेट पर हर तरह के डेटा को एक जैसा दर्जा देंगी. इंटरनेट सर्विस देने वाली इन कंपनियों में टेलीकॉम ऑपरेटर्स भी शामिल हैं.

इन कंपनियों को अलग अलग डेटा के लिए अलग-अलग कीमतें नहीं लेनी चाहिए. चाहे वो डेटा अलग-अलग वेबसाइटों पर विजिट करने के लिए हो या फिर अन्य सेवाओं के लिए.

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