BIKANER : तीन साल की मैत्रिका ने जीती बीमारी से जंग, चौथे ऑपरेशन के बाद घर में लौटीं खुशियां
बीकानेर, 28 अगस्त। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के स्लोगन को लेकर बीकानेर के रहने वाले माता-पिता ने मिसाल पेश की है। 23 मई 2018 को मैत्रिका आचार्य का बीकानेर के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन से जन्म हुआ था। आनंद आचार्य के घर मे तीसरी पीढ़ी में यह पहली बच्च्ची है। मैत्रिका का जन्म होने पर घर में खुशियां का महौल रहा।

भोजन नली में दिक्क्क्त
कुछ ही घण्टों में पता चला की मैत्रिका स्वस्थ नहीं है। इसके भोजन नली में दिक्क्क्त है। यह बात सुनकर परिवार वालों के चेहरे पर खुशियों की जगह मायूसी छा गई। अब परिवार वालों की जिद थी कि कैसे भी करके बेटी को बचाना है। माता-पिता, परिवार के अथक प्रयासों के बाद 3 बड़े ऑपरेशन होने के बाद मैत्रिका आचार्य पूरी तरह से स्वस्थ है और 3 साल बाद सामान्य बच्चे की तरह मुंह से खाना खा रही है।

दूध पिलाया तो उल्टी कर दी
मैत्रिका की मां मोनिका ने बताया कि 23 मई 2018 को जन्म के बाद उसे मां ने दूध पिलाया तो उल्टी कर दी। डॉक्टर ने उसके कुछ टेस्ट किए तो पता चला कि उसके शरीर में आहार नाल सही नहीं है। जन्म के दिन ही उसे लेकर जयपुर गए। वहां जेके लोन अस्पताल में उसका एक ऑपरेशन हुआ, जिसमें डॉक्टर ने भोजन नली को पेट से जोड़ा।

ICU में वेंटिलेटर पर रखा
ऑपरेशन करने के बाद डॉक्टरों ने उसे करीब 15 दिन तक ICU में वेंटिलेटर पर रखा और फिर रिकवर होने के बाद मैत्रिका को छुट्टी दे दी।सोचा सब ठीक हो गया, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हर दूसरे दिन उसे निमोनिया की शिकायत रहने लगी। फिर कुछ भी मुंह में देते ही वो उल्टी कर देती। इसके बाद वापस जयपुर में संतोकबा दुर्लभजी में डॉक्टरों में दिखाया।

भोजन नली का रास्ता सिकुड़ गया
डॉक्टरों ने कुछ टेस्ट किए तो पता चला कि भोजन नली का रास्ता सिकुड़ गया है और उस नली में छेद हो गया। इसलिए जो भी भोजन दे रहे हैं। वह पेट में जाने की बजाय सांस नली और फेफड़ों में जा रहा है, जिससे इसको बार-बार निमोनिया हो रहा है। इस पर डॉक्टर ने ऑपरेशन करने की सलाह दी और प्रारंभिक तौर पर उसके नाक से एक राइस ट्यूब डाली गई और सीधे उसका कनेक्शन पेट से किया गया ताकि भोजन बराबर मिलता रहे।

बड़ा ही कठिन समय था
ये ट्यूब हर 10 से 15 दिनों में बदलवानी पड़ती और बदलना इतना पीड़ादायक होता था कि आंखों से आंसू आ जाते। मैत्रिका इतनी रोती थी कि उसके नाम से ही घबरा जाती। बड़ा ही कठिन समय था लेकिन परिवार के सभी सदस्यों में मैत्रिका का साथ दिया।

डेढ़ साल तक ऑपरेशन नहीं हुआ
इसी दौरन कोरोना आ गया। जिसके चलते डेढ़ साल तक इसका ऑपरेशन नहीं हुआ और वह ट्यूब के सहारे ही लिकविड खाना लेती। कई बार दूसरों को मुंह से खाते देख मैत्रिका आचार्य को भी मुंह से खाने की इच्छा होती, मगर ट्यूब बदलवने के चक्कर में वह मान जाती।

टीके नहीं लगवाए
मैत्रिका के पिता आनंद आचार्य ने बताया कि उनके लिए पिछले तीन साल का समय जीवन का सबसे बड़ा कठिन समय था। मैत्रिका को बुखार, सिर दर्द, दस्त, पेट दर्द होता तो उसे दवा नहीं दे पाते थे। इसी डर की वजह से जन्म के बाद बच्चों को लगाये जाने वाले टीके नहीं लगवाए, सोचा कि अगर टीके लगवाएंगे तो बुखार आएगा।

स्वास्थ्य के प्रति पूरी तरह सजग
उन्होंने बताया वैसे तो मैत्रिका के स्वास्थ्य के प्रति पूरी तरह सजग रहते थे, फिर भी कभी-कबार बुखार या सिर दर्द होता तो घरेलू व देशी इलाज ही करते थे। कहते हैं ना कि घर में अगर बच्चा बीमार हो जाए तो पूरा परिवार परेशान हो जाता है। पिछले तीन साल से आनंद का परिवार मैत्रिका की इस दुर्लभ बीमारी को लेकर काफी परेशान था। परंतु अब ऑपरेशन सफल होने के बाद परिवार में खुशियां लौट आई है।
वहीं, मैत्रिका भी मुंह से भोजन कर रोमांचित है। अब वह सामान्य बच्चों की तरह है। असहनीय दर्द देने वाली नाक में लगी ट्यूब भी अब हट गई। जयपुर के एक निजी अस्पताल में करवाए गए सफल ऑपरेशन के बाद मैत्रिका वापस अपने घर लौट आई है।
मैत्रिका के पिता आनंद ने बताया कि बच्ची के सफल ऑपरेशन में नर्सिंगकर्मी राजकुमार, पंडित अशोक रंगा, पुरषोत्तम आचार्य, लक्ष्मण राघव, ऊर्जा मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला व पीबीएम अस्प्ताल के सृजन डॉक्टर गिरीश प्रभाकर का विशेष रहा।
मां मोनिका ने बताया कि डॉक्टरों से पता चला कि उनकी बेटी जन्मजात रोग पीड़ित है। इसे ट्रेकियो इसोफेसियल फिस्टुला रोग कहा जाता है। यह फूड पाइप व विंड पाइप के बीच हुआ गलत कनेक्शन है। जन्म से पहले ही शरीर में ये रोग हो जाता है। भोजन पेट में पहुंचने के बजाय इधर-उधर चला जाता है। कई तरह के इंफेक्शन हो सकते हैं और निमोनिया नियमित रूप से बना रहता है।
इतना ही नहीं कुछ भी खाते ही बच्चा उल्टी कर देता है। पानी तक भी शरीर में नहीं जाता। समय पर ध्यान नहीं देने पर इस रोग के साथ ही किडनी, हार्ट आदि पर भी असर हो सकता है। यह बीमारी इतनी गम्भीर है कि बच्चों की जान भी चली जाती है।












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