कोटा वृद्धि को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पटना HC ने नीतीश सरकार से मांगा जवाब, 12 जनवरी को होगी सुनवाई
बिहार के नए आरक्षण कानून को लेकर पटना हाई कोर्ट ने नीतीश सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने शुक्रवार, 1 दिसंबर को बिहार सरकार को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए हाल ही में बढ़ाए गए आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश के विनोद चंद्रन की अगुवाई वाली खंडपीठ ने नीतीश सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है। महाधिवक्ता पीके शाही की अगुआई में उच्च न्यायालय में सरकार का पक्ष रखा गया। इस मामले में अब अगली सुनवाई 12 जनवरी को होगी।

याचिकाकर्ताओं ने पिछले महीने बिहार विधानसभा द्वारा सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के अलावा कोटा बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने के पारित कानूनों को "असंवैधानिक" बताया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रसिद्ध इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने "कुल आरक्षण सीमा को 50 प्रतिशत तक सीमित कर दिया था जिसे केवल अत्यंत असाधारण मामलों में बदला जा सकता था।"
नीतीश सरकार पर "सिर्फ पिछड़े वर्ग की बढ़ती आबादी के आधार पर" कदम उठाने का आरोप भी लगाया गया है। बिहार सरकार द्वारा करवाए गए जाति आधारित गणना की रिपोर्ट पर भी याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जारी किए गए आकड़ों में गड़बड़ी की चर्चा तेज है। ऐसी संभावना है कि सर्वेक्षण के आंकड़े राजनीति से प्रेरित हों।
सरकार ने हाल ही में जाति सर्वेक्षण कराया था जिसमें ओबीसी और ईबीसी की संयुक्त आबादी 63.13 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया था। आकड़ों के सामने आने के बाद से ही बिहार में सियासत तेज हो गई थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित भाजपा नेताओं ने यादवों और मुसलमानों की संख्या को बढ़ाने का आरोप लगाया था। यादव और मुसलमान दोनों को ही महागठबंधन के वोट बैंक का एक अहम हिस्सा माना जाता है। हालांकि, डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि यदि ऐसा होता तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अपनी जाति की आबादी का प्रतिशत भी ज्यादा दिखाया गया होता। जाति आधारित गणना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जाति भी संख्यात्मक रूप से छोटी है।
इन सभी चर्चाओं के बीच नीतीश सरकार ने भाजपा को "आरक्षण विरोधी" करार दिया था। स्थानीय निकाय चुनावों और जाति जनगणना में ईबीसी के लिए आरक्षण के रास्ते में बाधा डालने वाली याचिकाओं के पीछे भाजपा के समर्थकों के शामिल होने का आरोप भी सत्ताधारी दल ने लगाया था।
हालांकि, भाजपा ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि जब विधानसभा में इससे संबंधित कानून लाए गए थे, तब बीजेपी ने आरक्षण समर्थक कदमों का समर्थन किया था। जब सरकार ने जाति सर्वेक्षण कराने का फैसला किया था तब बीजेपी सत्ता में भागीदारी कर रही थी।
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