Opposition meeting: पटना में जुटीं विपक्षी पार्टियों को पहली बैठक से कितनी है उम्मीद, आगे क्या होगा रास्ता?

Opposition meeting in Patna: बिहार की राजधानी पटना में शुक्रवार को विपक्षी एकता के लिए सभी दल जुटते, उससे एक दिन पहले ही अलग-अलग बयानों से यह लगा कि पहली बैठक से बहुत ज्यादा उम्मीदें किसी को नहीं हैं। अलबत्ता बड़ी बात है कि बीजेपी के खिलाफ काफी सारे दल एक मंच पर आने को राजी तो हुए।

बैठक से पहले विपक्षी गठबंधन के लक्ष्य को लेकर संदेह इस वजह से पैदा हुआ, क्योंकि बैठक में शामिल होने वाली पार्टियों में इस बात पर तो आमराय दिखी कि केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ एकसाथ खड़े होना जरूरी हो गया है। लेकिन, चुनावी तालमेल को लेकर कई सारे दलों की दुविधा भी खुलकर सामने आ गई।

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हम अकेले चुनाव लड़ेंगे- आम आदमी पार्टी
मसलन, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) संदीप पाठक ने ईटी से कह दिया कि 'अगर सवाल चुनाव लड़ने का है, तो आम आदमी पार्टी का बहुत साफ कहना है कि हम अकेले चुनाव लड़ेंगे और किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन में नहीं लड़ेंगे। हम विपक्ष की बैठक में एक ऐसा तंत्र तैयार करने पर विचार कर रहे हैं, जहां विपक्षी दल हमारे देश के सामने उठने वाले मुद्दों पर मिलकर काम कर सकें।'

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बीजेपी के खिलाफ एक उम्मीदवार है विपक्ष का मुख्य एजेंडा
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की पार्टी का यह ऐलान पटना की बैठक के मुख्य एजेंडे के ही विपरीत है। मसलन, गुरुवार को इसके लिए पटना पहुंचीं पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी साफ किया था कि बैठक का मूल उद्देश्य एक परिवार की तरह भाजपा के खिलाफ विपक्ष का एक ही उम्मीदवार देने पर विचार के लिए है। नीतीश कुमार के अलावा पटना में हो रही विपक्षी दलों की एकजुटता बैठक के सूत्रधारों में बनर्जी भी शामिल रही हैं।

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विपक्षी दलों का आगे का रास्ता और होगा चुनौतीपूर्ण
सिर्फ केजरीवाल की पार्टी ही नहीं, सीपीआई के महासचिव डी राजा की बातों से भी लगता है कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने अपने सहयोगी राजद नेता लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का जो सपना देखा है, उसे अमलीजामा पहनाना बच्चों का खेल साबित नहीं होने वाला है। विपक्षी एकता की आगे की लड़ाई और भी चुनौतीपूर्ण होगी।

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सीटों का बंटवारा प्रदेश इकाइयों पर छोड़ें- सीपीआई
सीपीआई नेता ने कहा है कि विपक्षी दलों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर एक समझदारी होनी चाहिए। लेकिन, लेकिन जहां तक चुनावी रणनीति और सीटों के बंटवारे की बात है त यह प्रदेश इकाइयों पर छोड़ देनी चाहिए। दरअसल वामपंथी दल करें भी क्या, ये इनकी राजनीतिक मजबूरी है।

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विपक्षी दलों में कहीं दोस्ती, कही दुश्मनी
क्योंकि, एक दल किसी राज्य में वामपंथी दलों का परम मित्र है, तो उसी पार्टी से दूसरे राज्य में यह कट्टर दुश्मनों वाला रोल निभाते हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट में आज ऐसी गहरी दोस्ती हो चुकी है कि अफसाने लिख दिए जाएं। लेकिन, केरल में एक-दूसरे का गला काटने के लिए तैयार नजर आते हैं। क्योंकि, बंगाल में दोनों की दुश्मनी टीएमसी और बीजेपी से है। जबकि, केरल में एक सत्ता में और दूसरे विपक्ष में होते हैं।

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'बाकी चीजें बाद में तय की जा सकती हैं'
यही वजह है कि जदयू नेता विजय चौधरी ने भी बताया, 'बैठक का एजेंडा बीजेपी के खिलाफ रणनीति और योजना बनाना और कैसे एकजुट होकर संयुक्त मोर्चा खड़ा किया जाए इसपर चर्चा करना है। बाकी चीजें बाद में तय की जा सकती हैं, लेकिन सभी भागीदार इस बात पर सहमत हैं कि एकजुट होकर हम बीजेपी को हरा सकते हैं।' कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी इशारा किया कि इस बैठक से कोई तीर मार लेने की उम्मीद करना अवास्तविक होगा।

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