Nishant क्यों नहीं बने बिहार के डिप्टी CM? आखिरी वक्त बदला खेल, नीतीश ने बेटे को क्यों रोका, अब क्या है प्लान?
Nishant Kumar: बिहार की राजनीति में पिछले कुछ घंटों में जो कुछ हुआ, उसने बड़े-बड़े सियासी पंडितों को हैरान कर दिया है। जहां एक तरफ सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाल ली है, वहीं दूसरी तरफ सबकी निगाहें एक ही नाम को तलाश रही थीं, निशांत कुमार।
कयास लगाए जा रहे थे कि नीतीश कुमार अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर अपने बेटे निशांत को डिप्टी सीएम (Deputy CM) की कुर्सी पर बैठाएंगे। लेकिन जब शपथ ग्रहण हुआ, तो नजारा कुछ और ही था। जेडीयू कोटे से दो पुराने दिग्गजों, विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने शपथ ली, लेकिन निशांत गायब रहे।

निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाए जाने की आखिरी समय तक चर्चा थी, उन्हें मनाने की कोशिशें चल रही थीं, लेकिन आखिरकार उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि लंबी मान-मनौव्वल के बाद भी निशांत नहीं माने? क्या यह नीतीश कुमार की कोई सोची-समझी रणनीति है या फिर निशांत का अपना कोई मास्टरप्लान? निशांत कुमार डिप्टी CM नहीं बने तो अब आगे क्या करेंगे। आइए इस पूरी इनसाइड स्टोरी को समझते हैं।
Nishant Kumar ने क्यों ठुकरा दी उपमुख्यमंत्री की कुर्सी? ये हो सकते हैं 3 कारण
1. सीनियरिटी का सम्मान या भविष्य की बिसात?
नीतीश कुमार की राजनीति को करीब से जानने वाले लोग जानते हैं कि वे 'अनुभव' को हमेशा प्राथमिकता देते हैं। निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री न बनाकर नीतीश ने पार्टी के भीतर और बाहर एक बड़ा संदेश दिया है। जेडीयू कोटे से बने दोनों डिप्टी सीएम- विजय चौधरी (भूमिहार) और बिजेंद्र यादव (यादव समाज)- न केवल नीतीश के पुराने साथी हैं, बल्कि पार्टी के मजबूत स्तंभ भी हैं।
नीतीश ने यह साफ कर दिया कि पार्टी में 'वफादारी' और 'सीनियरिटी' की कीमत है। अगर वे सीधे निशांत को इस पद पर बैठा देते, तो पार्टी के भीतर पुराने नेताओं में असंतोष पैदा हो सकता था। निशांत भी इस बात को बखूबी समझते हैं कि अगर उन्हें लंबी पारी खेलनी है, तो उन्हें पार्टी के इन अनुभवी दिग्गजों का विश्वास जीतना होगा। फिलहाल किनारे रहकर उन्होंने वरिष्ठों को तरजीह दी है, जिससे पार्टी में उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी।
2. 'परिवारवाद' के दाग से बचने की बड़ी कोशिश
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की सबसे बड़ी पूंजी उनकी 'छवि' रही है। वे दशकों से लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर 'परिवारवाद' (Dynastic Politics) का आरोप लगाकर सत्ता में बने रहे। वे अक्सर अपने भाषणों में कहते हैं, "2005 से पहले बिहार में क्या था? वो हटे तो पत्नी को सीएम बना दिया, अपने परिवार के लिए सब किया।"
सूत्रों की मानें तो निशांत कुमार खुद नहीं चाहते थे कि राजनीति की शुरुआत ही 'परिवारवाद' के टैग के साथ हो। अगर वे सीधे डिप्टी सीएम बनते, तो विपक्ष (RJD और कांग्रेस) को हमला करने का सीधा मौका मिल जाता। उन्हें भी तेजस्वी यादव या उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश की तरह 'वंशवाद की उपज' करार दिया जाता। नीतीश कुमार ने अपने बेटे को सरकार से दूर रखकर नैतिक रूप से खुद को ऊंचा साबित करने की कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से नीतीश की आलोचना कम होगी और निशांत एक 'फ्रेश' लीडर के तौर पर उभरेंगे।

3. सबसे बड़ी चुनौती: नीतीश का 'वोट बैंक' बचाना
पद से ज्यादा जरूरी इस वक्त जेडीयू के वजूद को बचाना है। नीतीश कुमार का अपना एक साइलेंट और सॉलिड वोट बैंक है, जिसमें कुर्मी, महादलित, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और आधी आबादी (महिलाएं) शामिल हैं। लगभग 16% का यह वोट बैंक ही नीतीश की ताकत रहा है।
नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे हटने की खबरों ने इस वोट बैंक में थोड़ी बेचैनी और नाराजगी पैदा की है। निशांत के लिए इस समय सचिवालय में बैठकर फाइलें निपटाने से ज्यादा जरूरी है जमीन पर उतरना। अगर जेडीयू का संगठन बिखर गया, तो डिप्टी सीएम का पद भी किसी काम का नहीं रहेगा। निशांत अब संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच जाकर पिता वाला 'भरोसा' जगाने पर ध्यान देंगे। वे साबित करना चाहते हैं कि वे सिर्फ 'नीतीश के बेटे' नहीं, बल्कि जन-जन के नेता बनने की काबिलियत रखते हैं।
अब आगे क्या करेंगे निशांत? क्या है उनका 'रोडमैप'? (Nishant Kumar Future Plan: What Next?)
निशांत कुमार ने सरकार में शामिल न होकर एक कठिन रास्ता चुना है। रिपोर्ट के मुताबिक, वे जल्द ही पूरे बिहार की यात्रा पर निकल सकते हैं। इस यात्रा का मकसद सीधा है लोगों की समस्याओं को समझना, सरकारी कामकाज का फीडबैक लेना और पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करना।
निशांत अभी खुद को एक 'स्वतंत्र नेता' के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं। जेडीयू पिछले 23 सालों से सिर्फ नीतीश के नाम पर चल रही है। अब जब नीतीश कुमार दिल्ली की राजनीति की ओर रुख कर रहे हैं, तो बिहार में जेडीयू के सामने 'तीसरी धुरी' बने रहने का संकट है। अगर निशांत लोगों का दिल नहीं जीत पाए, तो जेडीयू का वोटर बीजेपी, तेजस्वी यादव या प्रशांत किशोर की ओर शिफ्ट हो सकता है। निशांत अगले कुछ महीने इसी 'वोट बैंक की घेराबंदी' में लगाएंगे।
निशांत कुमार अब तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे हैं। ऐसे में सीधे डिप्टी CM बनना उनके लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा कदम हो सकता था। विपक्ष इसे मुद्दा बनाता और जेडीयू की छवि को नुकसान पहुंचता। इसलिए एक रणनीति के तहत उन्हें पहले संगठन और जनता के बीच काम करने का मौका दिया जा रहा है, ताकि वे धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत कर सकें।

JDU का भविष्य और BJP का 'हिडन प्लान' (JDU Future)
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी का भी अपना गणित है। बीजेपी को पता है कि अगर नीतीश के बाद जेडीयू ताश के पत्तों की तरह बिखरी, तो बिहार का सियासी समीकरण बिगड़ जाएगा। बीजेपी नहीं चाहती कि जेडीयू का वोट बैंक सीधे तौर पर आरजेडी या किसी तीसरे विकल्प (जैसे प्रशांत किशोर) के पास जाए।
यही वजह है कि बीजेपी भी निशांत कुमार के पक्ष में खड़ी दिख रही है। माना जा रहा है कि बीजेपी के रणनीतिकारों ने ही निशांत को धीरे-धीरे राजनीति में उतारने का प्लान बनाया है। अभी वे भले ही सरकार का हिस्सा न हों, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि अगले एक साल के भीतर संगठन पर पकड़ मजबूत करने के बाद निशांत कुमार को बड़े ताम-झाम के साथ डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है।
अभी नहीं, लेकिन आगे बड़ा रोल तय
नीतीश कुमार ने अपने बेटे को उपमुख्यमंत्री न बनाकर एक 'मास्टरस्ट्रोक' खेला है। निशांत कुमार का डिप्टी CM न बनना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। इस फैसले में परिवारवाद से दूरी, सीनियर नेताओं का सम्मान, वोट बैंक की सुरक्षा और भविष्य की तैयारी इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखा गया है।
निशांत के लिए यह 'वेट एंड वॉच' की स्थिति है। वे सत्ता की मलाई खाने के बजाय पहले जनता की अदालत में अपनी साख बनाना चाहते हैं। अगर वे पिता की विरासत और वोट बैंक को संभालने में कामयाब रहे, तो आने वाले समय में वे बिहार की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी साबित होंगे। अब असली परीक्षा निशांत कुमार की है। अगर वे जमीन पर खुद को साबित कर पाए, तो बिहार की राजनीति में उनका बड़ा रोल तय है।















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