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NDA में सीट शेयरिंग को लेकर सस्पेंस, चिराग और मांझी के दबाव के बीच नीतीश कुमार की भूमिका पर सवाल!

NDA Seat Sharing: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 नजदीक आते ही राजनीतिक दलों के बीच सीट बंटवारे की खींचतान तेज हो गई है। खासकर एनडीए खेमे में स्थिति 2020 की तुलना में बिल्कुल बदली-बदली नज़र आ रही है। तब एनडीए ने बिना किसी झिझक के नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया था।

जेडीयू को बड़े भाई का दर्जा देते हुए 115 सीटें दी थीं, जबकि भाजपा ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन आज, नीतीश कुमार के दर्जे और जेडीयू की स्थिति को लेकर एनडीए के भीतर असमंजस साफ दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी का रुख इस बार अस्पष्ट है।

NDA Seat Sharing

कभी हां, कभी ना और कभी खामोशी-इन तीनों ही अंदाजों से भाजपा यह संकेत देती दिख रही है कि अबकी बार वह नीतीश को पहले जैसी प्राथमिकता देने के मूड में नहीं है। सीटों के बंटवारे में 'कौन बड़े भाई' की लड़ाई 2025 के चुनावी समीकरणों की सबसे अहम कड़ी बन गई है।

भाजपा चाहती है कि वह जेडीयू के बराबर या उससे थोड़ा ऊपर दिखे, वहीं जेडीयू इस बात पर अड़ी है कि नीतीश कुमार की साख और अनुभव को देखते हुए उसे कमतर नहीं आंका जा सकता। इस रस्साकशी को और पेचीदा बना रहा है चिराग पासवान का कारक। पिछली बार चिराग ने अपनी पार्टी को एनडीए का हिस्सा दिखाते हुए भी अलग चुनाव लड़ा और 134 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर पूरे समीकरण को बिगाड़ दिया था।

अब जब चिराग पासवान एनडीए में औपचारिक तौर पर शामिल हैं, तो भाजपा और जेडीयू दोनों को उनके लिए सीटें निकालनी होंगी। यही वजह है कि सीट शेयरिंग का गणित आसान नहीं रह गया है। जीतन राम मांझी का भी दबाव अलग से है। उनकी पार्टी की भूमिका भले सीमित हो, लेकिन बिहार की जातीय राजनीति में मांझी फैक्टर को नजरअंदाज करना आसान नहीं।

ऐसे में एनडीए को हर सहयोगी की महत्वाकांक्षा का हिसाब रखना पड़ रहा है। असल सवाल यही है कि क्या भाजपा और जेडीयू अपने पुराने विश्वास और तालमेल की राह पर लौट पाएंगे, या फिर सीटों का यह खींचतान गठबंधन की नींव को कमजोर कर देगा। बिहार की जनता यह बखूबी देख रही है कि नीतीश कुमार को लेकर एनडीए के भीतर भरोसा कम हुआ है।

भाजपा का मौन या असमंजस कहीं ना कहीं नीतीश की स्थिति को चुनौती देता है। बिहार की राजनीति में यह नया दौर है। यहां हर सीट, हर जातीय समीकरण और हर चेहरे का महत्व है। ऐसे में एनडीए को तय करना होगा कि सीटों की यह जंग जीत की ओर ले जाएगी या अंदरूनी दरारों को और गहरा कर देगी।

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