Motivational Story: दिव्यांग बने दिव्यांगों के लिए मसीहा, सैकड़ों से ज्यादा लोगों की बदल चुके हैं जिंदगी
दिव्यांगों को कोई मजबूर और बेचारा नहीं समझे इसलिए भागलपुर के दो युवक शाहिद और विक्रम दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं। लोग दोनों के पहल की काफी सराहना कर रहे हैं।

Motivational Story: इंसान के अंदर जज्बा हो तो वह खुद की ज़िंदगी संवारने के साथ ही दूसरों की राह भी आसान कर सकते हैं। कुछ इसी तरह की कहानी है बिहार के भागलपुर ज़िले से ताल्लुक रखने वाले दो युवाओं की है। दोनों विभिन्न सेक्टर में काम करते हुए दिव्यांगों के लिए मसीहा बने हुए हैं। अक्सर लोग दिव्यांगों को देख कर कहते नज़र आ जाते हैं कि बेचारा दिव्यांग है यह कैसे खुशहाल ज़िंदगी बसर कर पाएगा। भागलपुर के रहने वाले विक्रम और शाहिद हुसैन ने लोगों की सोच बदलते हुए ना सिर्फ खुद की ज़िंदगी संवारी बल्की अन्य दिव्यांगों की भी तस्वीर बदल दी है।

दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनान ज़रूरी
कोरोना काल के दौरान जब पूरी दुनिया मुसीबतों से जूझ रही थी, उस वक्त शाहिद और विक्रम दिव्यांगों की तस्वीर बदलने की योजना तैयार कर रहे थे। कोरोना काल में उन्होंने दिव्यांगों को एक साथ जोड़ना शुरू किया और दिव्यांगों का समूह बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की तैयारी में जुट गए। विक्रम नें पहले अपनी मुश्किलों पर फतह पाया उसके बाद वह दूसरों के लिए प्रेरणा बने। विक्रम खुद दिव्यांग होते हुए भी जमालपुर (मुंगेर) में लाइब्रेरियन पद पर काम कर रहे हैं। कृत्रिम पैर और ट्रायसाइकिल के सहारे चलने वाले विक्रम गोलाघाट (भागलपुर) के निवासी हैं। उनकी सोच यही है कि कोई भी दिव्यांग अपने परिवार पर बोझ नहीं बने इसलिए उन्हें आत्मनिर्भर बनाना ज़रूरी है।

दिव्यांगों को शिक्षा क्षेत्र में भी बढ़ा रहे आगे
विक्रम सोचते थे कि उनकी ज़िदंगी दिव्यांग के तौर पर बसर कैसे होगी, परिवार के लिए बोझ जैसा हूं। इन सब बातों को सोचकर वह खुद में निराश हो जाया करते थे। काफी सोचने के बाद उन्होंने पढ़ाई को हथियार बनाते हुए लाइब्रेरियन की नौकरी हासिल की। इसके बाद उन्होंने दिव्यांगों के लिए कुछ बेहतर करने का प्लान बनाया। कोरोना काल के दौरान उन्होंने दिव्यांगों का समूह बनाया और सबको अपने साथ जोड़ने लगे। 3 सौ से ज्यादा दिव्यांगों को अपने साथ जोड़ा और उनकी परेशानियों का हल निकालते चले गए। ज़रूरत के मुताबिक उनकी मदद करते हुए आज भी वह दिव्यांगों को शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।

'दिव्यांगों को कोई बेचारा नहीं समझे'
विक्रम के पहल के बारे में तो आपको जानकारी मिल गई, अब हम आपको भागलपुर ज़िले के जब्बारचक के रहने वाले शाहिद हुसैन के बार में बताने जा रहे हैं। शाहिद को यह बात बिल्कुल भी पसंद नहीं है कि लोग दिव्यांगों को कमज़ोर समझे। उनका कहना है कि दिव्यांगों को कोई बेचारा नहीं कहे इसलिए वह दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं। इसके मद्देनज़र शाहिद दिव्यांगों के स्वरोजगार के लिए हर मुमकिन कोशिश में लगे हुए हैं। दिव्यांगों को स्वोरज़गार दिलाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण भी देते हैं।
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दिव्यांगों को प्रशिक्षित कर बना रहे आत्मनिर्भर
दिव्यांगों के लिए स्वरोज़गार की पहल करने से पहले शादिद ने खुद का रोज़गार किया ताकि वह दूसरों के लिए उदाहरण सेट कर सकें। शाहिद ने ट्रायसाइकिल पर बैठ कर बुटिक और कपड़े का व्यापार शुरू किया। धीरे-धीरे वह कामयाबी हासिल करते चले गए। आज के वक्त में वह बखूबी अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं। खुद को मुश्किलों का हल निकालने के बाद शाहिद ने दिव्यांगों का समूह तैयार किया और फिर उनके हुनर को तराशते हुए प्रशिक्षित किया। ग़ौरतलब है कि अभी तक उन्होंने 100 से ज्यादा दिव्यांगों को ट्रेनिंग देकर आत्म निर्भर बना दिया है।
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