बिहार: कभी देश के पहले राष्ट्रपति पहुंचे थे देखने, अब गुमनामी का शिकार हुई 130 साल पुरानी लाइब्रेरी
सूत्रों की मानें तो बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार के वक्त दो करोड़ की राशि मंजूर हुई थी। इस साल जनवरी से ही लाइब्रेरी के सौंदर्यीकरण का काम होना था।
नांलदा, 31 अगस्त 2022। बिहार में एतिहासिक धरोहर काफी है लेकिन सरकार की अनदेखी की वजह से कई धरोहर गुमनामी का शिकार हो चुकी हैं। इसमें नालंदा जिला की 130 साल पुरानी लाइब्रेरी का नाम भी शामिल है। नालंदा के देशना गांव (अस्थावां प्रखंड) में मौजूद लाइब्रेरी को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी देखने पहुंचे थे। लेकिन अब राज्य सरकार की बेरुखी से अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी का वजूद धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।

सरकार की बेरुखी का शिकार हुई लाइब्रेरी
एतिहासिक अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी का सौंदर्यीकरण काम फंड की इंतजार में रूका हुआ है। आपको बता दें कि राजद के पूर्व विधायक पप्पु खां (नौशादुन नबी) की पहल के बाद सौंदर्यीकरण की आस जगी थी। जब बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार थी उस वक्त अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मंत्री जमा खां और उद्योग मंत्री शहनवाज़ हुसैन ने अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी को ई-लाइब्रेरी में बदलने की बात कही थी। लेकिन काग़ज़ी प्रक्रिया में ढिलाई की वजह से पुस्तकालय के लिए फंड जारी नहीं हो सका था। बिहार में हुई सत्ता परिवर्तन के बाद जमा खां फिर से अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मंत्री बनाए गए हैं। इसलिए लाइब्रेरी के सौंदर्यीकरण की आस जगी है।

1892 ई. में स्थापित की गई थी लाइब्रेरी
सूत्रों की मानें तो बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार के वक्त दो करोड़ की राशि मंजूर हुई थी। इस साल जनवरी से ही लाइब्रेरी के सौंदर्यीकरण का काम होना था। इस बाबत सीओ के द्वारा रिपोर्ट भी जमा होना था। पर्यटन विभाग ने पत्र भी जारी कर दिया था। लेकिन फिर लाइब्रेरी का काम होल्ड कर दिया गया। चूंकि बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ है तो लाईब्रेरी को ई-लाइब्रेरी में तब्दील करने पर विचार किया जा सकता है। ग़ौरतलब है कि अपने वक्त में ये लाइब्रेरी काफ़ी मशहूर थी। देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी लाइब्रेरी को देखने पहुंचे थे। 130 साल पुरानी लाइब्रेरी 1892 ई. में स्थापित की गई थी।

नायाब पुस्तकों का लाइब्रेरी में कलेक्शन
अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी में 1 लाख किताबों का संग्रह था, आज की तारीख में यहां कई नायाब किताबें मौजूद हैं। हयात-ए-सुलेमान, यारे अजीज हाथों से लिखी कुरानशरीफ का तुर्रा, इस्लामिक साहित्य पर लिखी पुस्तकें और पैगम्बर साहब की जीवनी से जुड़ी हज़ारों नायाब किताबें इस लाइब्रेरी में रखी गई थीं। यहां की नायाब किताबों के सेलेक्शन पर तत्कालीन राज्यपाल डॉ. जाकिर हुसैन ने देखा तो यहां कि किताबों को पटना के खुदाबख्श लाइब्रेरी भेज दिया गया था।

कई दुर्लभ किताबें आज भी हैं मौजूद
अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी में मौजूद किताबों के धरोहर को 1952 में 9 बैलगाड़ियों की मदद से खुदाबख्श लाइब्रेरी ले जाया गया था। ग़ौरतलब है कि किताबों की संग्रह के लिए अलग से देशना सेक्सन बनाया गया था। आज की तारीख में भी कई दुर्लभ किताबें अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी में मौजूद है लेकिन पढ़ने वाला कोई भी नहीं। इसकी खास वजह है कि सरकार की बेरुखी की वजह से लाइब्रेरी गुमनामी का शिकार हो चुकी है।
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