Hajipur Lok Sabha Seat पर कैसे बदल गया सियासी समीकरण, NDA के लिए नफ़ा या नुकसान
Lok Sabha Chunav को लेकर देश भर में सियासी पारा चढ़ा हुआ है, लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी रणनीति तय करनी शुरू कर दी है। इसी क्रम में बिहार में भी 'INDIA बनाम NDA' की सियासत तेज़ हो चुकी है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि हाजीपुर लोकसभा सीट से आखिर कौन होगा NDA उम्मीदवार, चाचा-भतीजे की रार एनडीए को नफ़ा या नुकसान।
लोकसभा चुनाव को लेकर शुरू हुई सियासी दांव पेंच हाजीपुर लोकसभा सीट पर सियासी समीकरण समझने वन इंडिया हिंदी की टीम ग्राउंड पर पहुंची और लोकसभा चुनाव को लेकर जनता के मूड को खंगालने की कोशिश की। इस दौरान जनता से आगामी चुनाव को लेकर कुछ सवाल भी पूछे गए।

हाजीपुर के मतदाताओं से बात करने पर जो तस्वीरें सामने आई हैं। इसमें हाजीपुर लोकसभा सीट पासवान परिवार और एनडीए गठबंधन के फेवर में है, लेकिन चाचा और भतीजे के बीच रार की वजह से नुकसान हो सकता है। क्योंकि हाजीपुर के मतदाता यह डिसाइड नहीं कर पा रहे है कि NDA की तरफ़ से उम्मीदवार कौन?
चाचा और भतीजे के बीच सीट को लेकर सियासी जंग शुरू है, ऐसे में एनडीए गठबंधन की तरफ़ से चुनाव तो एक ही पार्टी का उम्मीदवार लड़ेगा। हाजीपुर लोकसभा सीट को पशुपति पारस और चिराग पासवान ने नाक की लड़ाई बना ली है। ऐसे में अगर दोनों ही इस सीट पर चुनावी बिगुल फूंकते हैं तो फिर एनडीए को इस सीट से संतोष करना पड़ सकता है।
हाजीपुर सीट पर जातीय समीकरण देखें तो करीब 90 फीसद आबादी हिंदु समुदाय की है। वहीं 9 फीसद आबादी मुस्लिम समुदाय की है। जातीय दबदबा की बात करें तो पासवान,यादव, भूमिहार, राजपूत, कुशवाहा और रविदास समुदाय तादाद ज़्यादा है। अति पिछड़ों की चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
1977 के बाद से हाजीपुर सीट पर सिर्फ दो बार रामविलास पासवान चुनाव हारे। इस सीट पर 2019 तक पासवान परिवार का दबदबा रहा, लेकिन परिवार और पार्टी में टूट की वजह से सियासी फ़ुज़ा पूरी तरह से बदल गई। चाचा और भतीजा दोनों एनडीए में शामिल हैं, ऐसे में भाजपा नेताओं को चाहिए पशुपति पारस और चिराग को समझाते हुए किसी एक को चुनावी दंगल में उतारे।
नाक की लड़ाई मानते हुए अगर दोनों ने चुनावी दांव खेला तो पासवान परिवार का बना बनाया किला ध्वस्त हो जाएगा। एनडीए की बजाय इंडिया गठबंधन के खाते में हाजीपुर सीट चली जाएगी। क्योंकि पासवान परिवार का बनाया वोट बैंक, कुछ चिराग और कुछ पारस को जाएगा। कुछ क्नफ्यूज़ मतदाता दूसरे पाले में चले जाएंगे।












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