Flashback 2022: बिहार में कैसे हुआ सत्ता परिवर्तन, समझिए सियासी गणित ?
बिहार में NDA गठबंधन के साथ मिलकर जदयू ने 2020 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद से ही जयदू और भाजपा नेताओं के बीच मतभेद होने लगे थे। सत्ता परिवर्तन की कयासबाज़ी शुरू हो गई थी

Flashback 2022 : बिहार की राजनीतिक घटनाक्रम में इस साल हुए सत्ता परिवर्तन ने खूब सुर्खियां बटोरी। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि किस तरह से समीकरण बदले और बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी। प्रदेश में बदल रहे समीकरणों को देखते हुए सियासी गलियारों में अटकलों का बाज़ार गर्म हो चुका था। इसी क्रम में एनडीए गठबंधन की नींव रखने वाले नेता अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेताओं का भी ज़िक्र हुआ। लोगों का कहना था कि अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी ने जब एनडीए का गठन किया था उस वक्त गठबंधन टूटने के आसार नहीं के बराबर हुआ करते थे।

बिहार में कैसे हुआ सत्ता परिवर्तन ?
आज के दौर में तो समीकरण इस तरह बदलते हैं कि नेता फ्लाइट में उड़ान, मंत्री की हैसियत से करता है और जब फ्लाइट लैंड करती है तो सरकार ही बदल जाती है। बिहार में भी सत्ता परिवर्तन कुछ इस तरह से ही हुआ। भारतीय जनता पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश में जदयू के विधायक को उस वक्त तोड़ दिया था। जब पार्टी ने भाजपा को समर्थन देने का फ़ैसला किया था। बिहार की सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ थी की जदयू एनडीए गठबंधन दल के साथ विधानसभा चुनाव तो लड़ रही है, लेकिन भाजपा विधनासभा चुनाव में जदयू के खिलाफ ही रणनीति तैयार कर रही है।

लोजपा ने बिगाड़ा जदयू का खेल
बिहार में हुए 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू एनडीए गठंबधन का हिस्सा थी, वहीं लोजपा बिहार में एनडीए गठबंधन का हिस्सा नहीं थी। लेकिन चुनावी चर्चा में यह ज़िक्र होता था की 'लोजपा ही भाजपा है, भाजपा ही लोजपा है'। इसके अलावा लोजपा के नेता यह भी बयान देते हुए नज़र आ जाते थे कि हम बिहार में एनडीए गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन केंद्र में एनडीए के साथ हैं। इन बयानों से मतदाताओं के मूड पर काफी असर पड़ा। इसके अलावा लोजपा ने अपने ज्यादातर प्रत्याशी उस विधानसभा सीटों पर उतारे जहां जदयू ने उम्मीदवार उतारे थे।

नीतीश और तेजस्वी की मुलाक़ात से चढ़ा पारा
सियासी गलियारों में यह भी चर्चा तेज़ थी कि लोजपा उम्मीदवारों की वजह से ही विधानसभा चुनाव में जदयू का प्रदर्शन अच्छा नहीं हो पाया। विधानसभा चुनाव के नतीज़ों के बाद से जदयू और भाजपा नेताओं के बीच मतभेद शुरू हो चुका था। यह चर्चा तेज़ हो चुकी थी कि नीतीश कुमार एनडीए से किनारा कर, महागठबंधन के साथ सरकार बना लेंगे। वक्त गुज़रता गया मतभेद का सिलसिला बढ़ता चला गया। इसी क्रम में तेजस्वी यादव की इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार शामिल हुए। इसके बाद से सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट शुरू हो गई। चूंकि सीटों के मामले में भाजपा प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी थी। अगर उस वक्त नीतीश कुमार एनडीए से किनारा करते तो, भाजपा जोड़ तोड़ की सियासत कर सरकार बना लेती।

बिहार में भाजपा को ज़ोरदार झटका
भाजपा की सियासी रणनीति को देखते हुए सियासी गलियारों में चर्चा थी कि राजद अपने विधायकों की तादा बढ़ाएगी, इसके बाद नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन का साथ छोड़ देंगे और महागठबंधन के साथ मिलकर सरकार चलाएंगे। नीतीश कुमार की तेजस्वी यादव से हुए मुलाक़ात के बाद राजद ने सियासी चाल चलते हुए AIMIM के चार विधायकों को अपने पाले में कर लिया। इसके साथ ही राजद सीटों के मामले में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। तेजस्वी यादव के सियासी दावं के बाद जदयू के सभी विधायक, एमएलसी और सांसदों समेत दिग्गज नेताओं की बैठक हुई। उस बैठक में सभी ने एक मत में यही फ़ैसला लिया कि एनडीए गठबंधन में रहना है। इसके बाद ही नीतीश कुमार ने भाजपा से किनारा किया और महागठबंधन से हाथ मिलाते हुए नई सरकार बना ली। इस तरह बिहार में भाजपा को ज़ोर का झटका देते हुए महागठबंधन की सरकार बन गई।
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