FLASHBACK 2010: दिल्ली डेयरडेविल्स के क्रिकेटर तेजस्वी की ऐसे हुई थी पॉलिटिक्स में इंट्री

क्रिकेटर तेजस्वी यादव की ऐसे हुई थी पॉलिटिक्स में इंट्री

तेजस्वी ट्रेनी पॉलिटिशियन से सीएम इन वेटिंग कैसे बने ? वे 2015 में पहली बार विधायक बने। राजनीति की शुरुआत ही डिप्टी सीएम के पोस्ट से हुई। अब 2020 में वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। राजनीति में छलांग पर छलांग इसलिए लगा पाये क्योंकि वे लालू यादव के पुत्र हैं। लालू यादव पर वंशवाद का आरोप लगता रहा लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। 2010 में जब लालू ने 20 साल के तेजस्वी को 'ट्रेनी पॉलिटिशियन’ के रूप में रिक्रूट किया था तो बड़ी शान से कहा था, मेरा बेटा है, ये तो ऑटोमेटिक पार्टी में है, इसको ज्वाइन क्या कराना है। इतनी कम उम्र के लड़के के लिए एक दिग्गज नेता का उत्तराधिकार संभालना कोई हंसी खेल नहीं था। लेकिन लालू यादव ने अपनी सूझबूझ से सब मुमकिन कर दिया। एक शर्मीले युवक से तेजस्वी कैसे राजद के सबसे बड़े नेता बन गये ? इस सवाल के जवाब के लिए पलटते हैं अतीत के पन्ने।

तेजस्वी का पॉलिटिक्स में डेब्यू

तेजस्वी का पॉलिटिक्स में डेब्यू

23 सितम्बर 2010, पटना। लालू यादव ने एक खास प्रेस कांफ्रेंस बुलायी थी। मीडियाकर्मी वहां पहुंचे तो देखा कि तेजस्वी यादव लालू की बगल में बैठे हुए हैं। लंबे बाल, जींस और शर्ट पहने हुए तेजस्वी कहीं से नेता नहीं लग रहे थे। लेकिन लालू ने तो तेजस्वी को राजनीतिक पाठशाला में नामांकन के लिए ही ये प्रेसवार्ता बुलायी थी। उस समय तेजस्वी आइपीएल की दिल्ली डेयरडेविल्स टीम का हिस्सा थे। दिल्ली डेयरडेविल्स ने उन्हें 2009 में खरीदा था और 2012 तक वे टीम के सदस्य थे। लालू ने माइक संभाला और तेजस्वी की तरफ देख के कहा, ये लोग भी सीख रहा है कि पापा कैसे बोलते हैं। ये यहां पार्टी ज्वाइन करने नहीं आया है। ये तो पहले से पार्टी में ज्वाइन है, मेरा बेटा है। पत्रकारों ने मामला साफ करने के लिए पूछा, तो क्या तेजस्वी को औपचारिक रूप से दलीय राजनीति में उतार रहे हैं ? तो लालू ने कहा, ये तो बचपन से ही हमारी राजनीति में शामिल है। अब इसे अपने साथ रख कर पॉलिटिक्स की ट्रेनिंग दूंगा। इस बार के विधानसभा चुनाव (2010) में तेजस्वी भी प्रचार के लिए मेरे साथ रैलियों में शामिल होगा। यह चुनावी सभाओं में राजद के लिए वोट मांगेगा। जब उम्र हो जाएगी तो चुनाव भी लड़ेगा। उस समय तेजस्वी की उम्र 20 साल थी। विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयुसीमा है 25 साल। यानी तेजस्वी के चुनाव लड़ने में अभी पांच साल की देरी थी। पत्रकारों ने जब तेजस्वी से कुछ बोलने के लिए कहा तो उन्होंने थोड़ा झिझकते हुए उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने कहा, फिलहाल मैं पापा के साथ प्रशिक्षण लूंगा। लोगों से पार्टी के लिए समर्थन मांगूंगा। उनसे पूछा गया कि आप अपने पापा के साथ मंच पर कैसे बोलेंगे ? तो तेजस्वी ने थोड़ा बचकाने अंदाज में कहा था, पापा जब बोलने लगते हैं तो दूसरे को बोलने का मौका कहां देते हैं।

20 की उम्र में तेजस्वी का चुनावी भाषण

20 की उम्र में तेजस्वी का चुनावी भाषण

2010 का विधानसभा चुनाव 21 अक्टूबर से शुरू हुआ था। लालू के निजी सचिव रहे विनोद श्रीवास्तव पटना के बांकीपुर सीट से चुनाव लड़ रहे थे। उनके लिए लालू ने पटना के गांधी मैदान में 13 अक्टूबर को एक रैली की थी। इस रैली में लालू के बाद तेजस्वी ने भी भाषण दिया था। उन्होंने कहा था, मेरे पिता के चमत्कारी कार्य से रेलवे ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अब वे बिहार का भी चेहरा बदल देंगे। तेजस्वी ने यह भी कहा, अभी वो पॉलिटिकल ट्रेनिंग ले रहे हैं। ट्रेनी के रूप में भी तेजस्वी खूब बोले थे। उन्होंने कहा था, केन्द्र, बिहार के विकास के लिए लगातार पैसा भेज रहा है लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसका सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। तेजस्वी ने वाजपेयी सरकार पर बिहार के साथ सौतेला व्यवहार करने का भी आरोप लगाया था। हालांकि राजद इस सीट पर चुनाव हार गया था लेकिन तेजस्वी को जनसमूह के आगे भाषण देने प्रशिक्षण मिल चुका था। लालू यादव अपने पुत्र को करीने से राजनीतिक सांचे में ढाल रहे थे।

चुनाव के पहले तेजस्वी और तेज की लॉन्चिंग

चुनाव के पहले तेजस्वी और तेज की लॉन्चिंग

तेजस्वी 2015 में चुनाव लड़ने की उम्र पूरा कर रहे थे। इसके दो साल पहले ही लालू ने तेजस्वी और तेजप्रताप की पॉलिटिकल लॉन्चिंग के लिए मंच तैयार कर दिया। मई 2013 में लालू ने पटना के गांधी मैदान में परिवर्तन रैली का आयोजन किया था। इस रैली में लालू यादव ने मुनादी कर दी कि तेजप्रताप और तेजस्वी अब चुनावी मैदान में उतरेंगे। दोनों भाइयों की मंच पर शानदार इंट्री हुई। तब तक भारी भीड़ जमा हो चुकी थी। मंच पर केवल तेज प्रताप और तेजस्वी यादव हाथ जोड़े हुए दाखिल हुए। वे हाथ जोड़ कर पूरे मंच पर इस कोने से उस कोने तक घूम गये। लोग खुशी से चिल्ला रहे थे और हाथ हिला कर उनका अभिवादन स्वीकर कर रहे थे। दोनों भाइयों ने एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन अपनी भाव-भंगिमा से सब कुछ कह दिया। वे दो साल होने वाले चुनाव के लिए राजद समर्थकों से आशीर्वाद मांग रहे थे। इसके बाद नेताओं का भाषण का सिलसिल शुरू हुआ। इस तरह लालू ने अपने बेटों के लिए राजनीति पिच तैयार कर दी थी। 2015 में जब तेजस्वी ने उम्र सीमा पूरी कर ली तो उन्हें अपने बड़े भाई तेजप्रताप के साथ चुनावी मैदान में उतारा गया। लालू -नीतीश की लहर में तेजस्वी और तेजप्रताप की नैया पार लग गयी और वे विधायक बन गये।

तेजस्वी के सामने चुनौती

तेजस्वी के सामने चुनौती

2010 हो या 2013, लालू जब अपने बेटों को राजनीति में उतारने की तैयारी कर रहे थे तब सबसे अधिक आलोचना जदयू ने की थी। जदयू ने आरोप लगाया था कि लालू लोकतंत्र में वंशवादी साम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं। जब पत्रकारों ने लालू से जदयू के आरोप के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा था, आप लोग क्या सोचते हैं कि मेरे पुत्र कमल या तीर थाम लें ? नीतीश को बताना चाहिए कि उनके पुत्र क्या कर रहे हैं? सबसे खास बात ये कि राजद के नेताओं ने भी लालू यादव के इस फैसले की समर्थन किया था। राजद नेताओं का कहना था अगर लालू यादव अपने पुत्रों को राजनीति में ला रहे हैं तो इसमे गलत क्या है ? पंडित जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी ने भी तो यही किया। चौधरी चरण सिंह जैसे समाजवादी नेता ने भी अपने पुत्र अजीत सिंह को राजनीति में आगे बढ़ाया। कई और नेताओं ने ऐसा किया। लेकिन केवल लालू यादव को ही क्यों कठघरे में खड़ा किया जा रहा है ? लेकिन ये सात साल पहले की बात है। अब हालात पूरी तरह बदल गये हैं। 2020 के चुनाव के पहले यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या तेजस्वी ही लालू की विरासत संभालने के लिए सबसे योग्य नेता हैं ? क्या तेजस्वी को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करना लालू के लिए आत्मघाती साबित होगा ?

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