बिहार के बाहर बसे 90% प्रवासी मतदाताओं को SIR की जानकारी नहीं थी, नई रिपोर्ट ने उठाए कई सवाल

Bihar SIR: बिहार में हाल ही में हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची में भारी बदलाव किए गए, लेकिन एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार से बाहर रहने वाले 90% प्रवासी मजदूरों को इस प्रक्रिया की कोई जानकारी ही नहीं थी। यह खुलासा "स्टैंडर्ड वर्कर एक्शन नेटवर्क" (SWAN) की रिपोर्ट "For a Few Documents More" में किया गया है।

रिपोर्ट के अहम प्वाइंट

🔴 1. प्रवासियों को नहीं मिली जानकारी

  • रिपोर्ट में कहा गया है कि 19 से 21 जुलाई के बीच किए गए सर्वे में 338 प्रवासी मजदूरों से बातचीत की गई।
  • सर्वे के आधार पर रिपोर्ट में कहा गया है कि 90% मजदूरों ने बताया कि उन्हें SIR प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
  • 75% लोग EC की ऑनलाइन पोर्टल के बारे में नहीं जानते थे और 1% से भी कम लोगों ने फॉर्म ऑनलाइन भरा है।
Bihar SIR
Photo Credit: कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा बिहार SIR के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए

🔴 2. दस्तावेजों की कमी और भ्रम

  • चुनाव आयोग ने शुरुआत में 11 दस्तावेजों की सूची जारी की थी, जिनमें से
  • 35% मजदूरों के पास एक भी दस्तावेज नहीं था।
  • हालांकि, 96% के पास आधार कार्ड और 83% के पास वोटर ID कार्ड था -जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बाद में स्वीकार्य दस्तावेज मानने की बात कही।

🔴 3. प्रक्रिया में असंगति

  • जिन घरों में अधिकारी पहुंचे, उनमें 29% ने बताया कि अधिकारी ने दस्तावेजों के साथ फॉर्म लिया
  • 45% ने बताया कि सिर्फ आधार या वोटर ID के साथ फॉर्म लिया गया।

🔴 4. मजदूरों की परेशानियां और भय

द वॉयर में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई में रहने वाले मजदूर सलीम ने बताया कि उन्होंने नाम हटने के डर से बिहार वापस लौटना बेहतर समझा। एक मुस्लिम मजदूर ने कहा, "हमें बार-बार अपनी पहचान साबित करनी पड़ती है, जैसे मोबाइल को रीफ्रेश करते हैं। हमारे अधिकार छीने नहीं जाने चाहिए।" एक मजदूर ने कहा, "ऐसे कैसे हो सकता है कि एक फॉर्म नहीं भरने से वोट देने का अधिकार छिन जाए?"

रिपोर्ट कहती है कि "अनट्रेसेबल" यानी लापता मतदाता असल में वही लोग हैं जो आजीविका के लिए बिहार से बाहर हैं। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यह संशोधन प्रक्रिया नागरिकता के मूल सिद्धांत को ही पलट रही है और यह लाखों लोगों के वोटिंग अधिकार छिनने का खतरा पैदा कर सकती है।

अब चुनाव आयोग ने 64 लाख संदिग्ध मतदाताओं के लिए 30 दिनों का दावा-आपत्ति का समय दिया है। इस बीच यह रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में प्रवासी मतदाता इस अधिकार से वंचित हो सकते हैं।

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