तेजस्वी के अब अपनों ने ही उठाए सवाल, RJD की समीक्षा बैठक में क्या-क्या हुआ? ऐसे में कहां गायब हैं लालू के लाल?
Bihar Politics (Tejashwi Yadav news) : बिहार की राजनीति इन दिनों बेहद उथल-पुथल से गुजर रही है। बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल खुद को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रही है, लेकिन समीक्षा बैठकों में जो कुछ सामने आ रहा है, उससे साफ है कि मामला सिर्फ चुनावी रणनीति में चूक का नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर गहरे असंतोष की आग भी धधक रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अपने ही नेता तेजस्वी यादव की कोर टीम पर उंगली उठा रहे हैं, तो इस पूरे घटनाक्रम के बीच तेजस्वी खुद कहां हैं और क्यों पूरी तरह चुप्पी साधी हुई है। आरजेडी फिलहाल आरोपों, समीक्षाओं और असंतोष के भंवर में फंसी है। नेता एक-दूसरे पर सवाल उठा रहे हैं, सहयोगियों को कोस रहे हैं और तेजस्वी की चुप्पी स्थिति को और जटिल बना रही है।

RJD की समीक्षा बैठकें बनीं गुस्सा निकालने का मंच
2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी 25 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि पिछली बार वही पार्टी सबसे बड़ी बनकर उभरी थी। हार के बाद शुरू हुई समीक्षा बैठकों में नेताओं ने खुलकर अपनी नाराजगी रखी। मगध प्रमंडल की समीक्षा बैठक में हारे हुए उम्मीदवारों ने तेजस्वी यादव की कोर टीम पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि टीम की कार्यशैली ने चुनाव के दौरान बेहतर समन्वय नहीं बनने दिया।
उम्मीदवारों ने गठबंधन सहयोगियों-कांग्रेस, लेफ्ट, वीआईपी और आईआईपी-पर भी तगड़े आरोप लगाए कि चुनाव मैदान में उन्होंने वैसा समर्थन नहीं दिया जैसा उम्मीद की गई थी। कई नेताओं ने कहा कि गठबंधन में तालमेल की कमी हार की सबसे बड़ी वजह रही।
आरजेडी में समीक्षाओं का सिलसिला 9 दिसंबर तक जारी रहना है और हर बैठक में असंतोष की आवाजें और तेज होती जा रही हैं। सारण प्रमंडल की बैठक भी इसी कड़ी में होनी है, जहां फिर कई चुभते सवाल उठने की संभावना है।
कांग्रेस की समीक्षा बैठक भी विवादों से भरी
सिर्फ आरजेडी ही नहीं, महागठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस में भी समीक्षा बैठक टकराव का मैदान बन गई। दिल्ली में हुई बैठक में वैशाली उम्मीदवार इंजीनियर संजीव और पूर्णिया प्रत्याशी जितेंद्र यादव आपस में भिड़ गए।
इंजीनियर संजीव ने आरोप लगाया कि टिकट बंटवारे में गड़बड़ी हुई और चुनाव से ठीक पहले पार्टी में शामिल हुए 18 नए नेताओं ने नुकसान पहुंचाया। इस पर जितेंद्र यादव भड़क उठे और बहस इतनी बढ़ गई कि इंजीनियर संजीव ने उन्हें कथित तौर पर गोली मारने की धमकी तक दे दी। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई दी कि बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। ये घटनाएं साफ दिखाती हैं कि महागठबंधन सिर्फ चुनावी हार से ही नहीं, बल्कि भीतर से भी बिखर रहा है।
13 दिन बाद तेजस्वी दिल्ली पहुंचे, पटना में चुप्पी बरकरार
चुनाव नतीजों के बाद आरजेडी में उथल-पुथल मची है, लेकिन पार्टी के स्टार नेता तेजस्वी यादव लगभग गायब ही हैं। जिस दिन नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उस दिन तेजस्वी ने बस सोशल मीडिया से शुभकामनाएं दीं। इसके बाद वे लगातार मौन रहे।
हार के 13 दिन बाद यानी 27 नवंबर को वे अचानक पत्नी राजश्री और दोनों बच्चों कात्यायनी और इराज के साथ दिल्ली रवाना हो गए। पटना एयरपोर्ट पर सुरक्षा कर्मियों ने घेरा बनाकर उन्हें सीधा अंदर ले जाया, लेकिन उन्होंने मीडिया से एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया।
दिल्ली जाने की वजह क्या है, इस पर पार्टी भी कुछ नहीं बोल रही। चर्चा है कि यह पारिवारिक मुलाकात भी हो सकती है या फिर आगे की रणनीति पर किसी महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा। लेकिन चुप्पी ने रहस्य और गहरा दिया है।
RJD की दो बैठकें हो चुकीं, लेकिन तेजस्वी एक में भी नहीं गए
दिलचस्प यह है कि आरजेडी जहां पटना में अपनी हार की परतें खोलने में लगी है, वहीं तेजस्वी यादव समीक्षा बैठकों में शामिल ही नहीं हो रहे। जो नेता 171 रैलियां, 20 रोड शो और रोज 7-8 सभाओं के साथ चुनावी मैदान में हर जगह दिखाई देते थे, वही अब पार्टी दफ्तर के आसपास भी नहीं दिख रहे। समीक्षा बैठकों में "तेजस्वी कहां हैं" यह सवाल अब आम हो चुका है और शायद हाल के सालों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि पार्टी नेता ही अपने नेता की गैर-मौजूदगी पर खुलकर बोल रहे हैं।
171 रैलियों के बाद आई हार, क्या तेजस्वी निजी सदमे में हैं?
तेजस्वी यादव का चुनाव अभियान असाधारण था। उन्होंने अकेले 171 रैलियां कीं, 20 रोड शो किए और कई दिनों तक लगातार प्रतिदिन 4 जिलों में प्रचार किया। युवाओं की भीड़, बेरोजगारी का मुद्दा, महिलाओं की सक्रियता पब्लिक मूड देखकर खुद तेजस्वी अत्यंत आश्वस्त थे। उन्होंने यहां तक कहा था कि 14 नवंबर को नतीजे आएंगे और 18 को वे शपथ लेंगे।
लेकिन नतीजे उम्मीद से उलट आए। NDA 202 सीटें जीतकर सत्ता में लौट आया और महागठबंधन 35 सीटों पर अटक गया। इस भारी अंतर ने ना सिर्फ राजनीतिक समीकरण बदले, बल्कि तेजस्वी के मनोवैज्ञानिक आघात की चर्चा भी शुरू कर दी।
राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि जब कोई नेता अपने अभियान में इतना भावनात्मक और शारीरिक निवेश करता है, तो हार अक्सर निजी झटके की तरह लगती है। कई बार नेता सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाकर अपने दायरे में लौटते हैं, खुद से लड़ते हैं, सोचते हैं, और फिर सामने आते हैं।
तेजस्वी की चुप्पी को भी इसी नजरिये से देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या तेजस्वी यादव हार पचाने और ऊर्जा वापस पाने के लिए खुद को समय दे रहे हैं? या फिर क्या पार्टी के भीतर चल रही खींचतान ने उन्हें साहूकार की तरह दूरी बरतने पर मजबूर किया है?
बिहार की राजनीति में यह दौर बेहद निर्णायक है। अगर तेजस्वी सामने नहीं आए, तो पार्टी में नेतृत्व को लेकर सवाल और तेज होंगे। अगर वे रणनीति के साथ लौटते हैं, तो माहौल पलट भी सकता है। फिलहाल एक ही बात साफ है कि तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है।












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