क्या चिराग को चुन कर आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार को चुनौती दी है?

पटना, 14 अक्टूबर। क्या नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह का रिश्ता नीतीश-प्रशांत किशोर की तर्ज पर आगे बढ़ रहा है ? जदयू में कभी प्रशांत किशोर की हैसियत नम्बर दो की थी। लेकिन वे नीतीश कुमार से ही लड़ बैठे। नतीजे के तौर पर बाहर होना पड़ा। आरसीपी सिंह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। नम्बर दो ही हैसियत रखते थे। लेकिन जब से केन्द्रीय इस्पात मंत्री बने हैं कठोर परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

Has RCP Singh challenged Nitish Kumar by choose Chirag Paswan?

नये राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह से तनातनी के बाद नीतीश कुमार से भी उनकी युगलबंदी कमजोर हुई है। इस बीच इस्पात मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में चिराग पासवान को शामिल कर आरसीपी सिंह ने सबको अचम्भे में डाल दिया है। एक तरफ चिराग तारापुर उपचुनाव में जदयू को हराने के लिए ताल ठोक रहे दूसरी तरफ आरसीपी सिंह ने उन्हें अपने विभागीय समिति में सलाहकार बना लिया है। क्या नीतीश कुमार को चिढ़ाने के लिए ऐसा किया गया है ? जदयू का इंटरनल गेम अब किस लेवल तक जाएगा ?

उनसे तो सख्त परहेज है !

उनसे तो सख्त परहेज है !

नीतीश कुमार को चिराग पासवान से कितनी एलर्जी है यह रामविलास पासवान की बरसी के दिन दिख गया था। चिराग के घर जाने की बात तो दूर रही उन्होंने न्योता तक मंजूर नहीं किया था। विधानसभा चुनाव में चिराग के दिये आघात को वे शायद ही कभी भूल पाएं। जब चिराग ने रामविलास पासवान की बरसी मनायी तो नीतीश ने एक अल्फाज तक खर्च नहीं किये। लेकिन जब केन्द्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस ने रामविलास पासवान की पुण्यतिथि मनायी तो नीतीश ने भावनाओं का समंदर लहरा दिया। तब नीतीश ने कहा था, "रामविलास जी के प्रति मेरा श्रद्धा रही है और सब दिन रहेगी। उन्होंने जिस तरह से लोगों का विश्वास जीता उसे बनाये रखने की जिम्मेवारी हम सब की है। वे बहुत जल्दी हमें छोड़ कर चले गये। रामविलास जी की स्मृति को हम जन-जन तक पहुंचाएंगे।" ये तो हद हो गयी। जब नीतीश कुमार को रामविलास पासवान के प्रति इतनी श्रद्दा थी तो उन्होंने चिराग के कार्यक्रम से क्यों दूरी बना ली ? जानकारों के मुताबिक, ऐसा इसलिए हुआ क्यों कि नीतीश कुमार को चिराग से सख्त परहेज है। अब उस चिराग को अगर आरसीपी सिंह अपने विभागीय समिति में सलाहकार बनाएंगे तो क्या होगा ? चिराग भला कब से हिंदी के जानकार हो गये ? अब अगर कोई पत्थर से शीशा टकराएगा तो क्या होगा ? वह तो टूटेगा ही।

अगर चिराग के चलते तारापुर में हार गया जदयू तो...?

अगर चिराग के चलते तारापुर में हार गया जदयू तो...?

नीतीश कुमार का जख्म अभी भर भी नहीं पाया था कि चिराग उसे कुरेदने में लग गये। तारापुर उपचुनाव में लोजपा (चिराग) के कुमार चंदन जदयू के राजीव कुमार सिंह को चुनौती दे रहे हैं। चिराग की टीम तारापुर में कैंप कर रही और मुस्तैदी से चुनाव लड़ रही है। उनका दावा है कि कुमार चंदन सामाजिक समीकरण के हिसाब से एक मजबूत उम्मीदवार हैं। वैसे तारापुर है तो मुंगेर जिले के अधीन लेकिन यह विधानसभा क्षेत्र जमुई लोकसभा सीट का हिस्सा है। जमुई के सांसद चिराग पासवान हैं। लोजपा के चिराग गुट ने तारापुर में चुनाव कार्यालय खोल रखा है। सांसद (चिराग) के प्रतिनिधि चंद्रशेखर चौधरी चुनाव संचालन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। चिराग पासवान भी इसमें शामिल होंगे। कुमार चंदन ने इस बार भी जदयू के वोट काट दिये तो क्या होगा ? जदयू को ये चिंता खाये जा रही है। खुदा ना खास्ते अगर जदयू तारापुर सीट चिराग की वजह से हार जाता है तो नीतीश कुमार की राजनीति पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा। 'एंटी नीतीश' राजनीति एक नये मोड़ पर खड़ी हो जाएगी और चिराग उसके एक अहम किरदार बन जाएंगे। जिस चिराग के नाम से भी जदयू के नेताओं को परहेज है उन्हें आरसीपी सिंह ने इतनी इज्जत क्यों बख्शी ?

चिराग की इंट्री क्या किसी सवाल का जवाब है ?

चिराग की इंट्री क्या किसी सवाल का जवाब है ?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जदयू में ललन सिंह और आरसीपी सिंह की लड़ाई अह निर्णायक मोड़ पर पहुंच गयी है। नीतीश कुमार के हस्तक्षेप से यह लड़ाई कुछ समय के लिए धीमी पड़ जाती है। लेकिन मौके-बेमौके अंदर की आग बाहर आ ही जाती है। इस विवाद की वजह से नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह का रिश्ता प्रभावित हुआ है। आरसीपी सिंह केन्द्रीय मंत्री बन गये और सांसद ललन सिंह मौका चूक गये, इसकी टीस अरसे तक जदयू को परेशान करती रहेगी। आरसीपी सिंह के समर्थक अंदर ही अंदर इस बात से खफा हैं कि पार्टी में पैदा हुई दिक्कतों के बारे में ललन सिंह से क्यों नहीं कोई सवाल पूछा जाता ? हर बार आरसीपी सिंह को ही क्यों सफाई देनी पड़ती है ? वैसे भी बिहार की राजनीति में कास्ट इक्वेशन ही सौलिड मैथेमेटिक्स है। आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के स्वजातीय हैं जब कि ललन सिंह सवर्ण समाज से आते हैं। पिछड़ावाद की राजनीति में सवर्ण समाज का नेतृत्व किस हद तक स्वीकार होगा ? जदयू के कई नेताओं को ललन सिंह का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना रास नहीं आ रहा। ऐसी स्थिति में चिराग पासवान का आरसीपी सिंह के विभाग में सलाहकार बनना क्या संकेत देता है ? क्या किसी सवाल का जवाब है यह सेलेक्शन ?

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