Bihar Politics: आजादी के बाद किस तरह बदली बिहार के सियासत की तस्वीर, कांग्रेस ने 6 साल में 3 CM बदल दिए थे

Bihar Politics: बिहार का राजनीतिक परिदृश्य हमेशा से ही गतिशील और दिलचस्प रहा है। आज़ादी के बाद कांग्रेस के दौर से लेकर जनता दल के उदय और लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के प्रभुत्व तक, बिहार ने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव देखे हैं।

1967 में कांग्रेस सरकार गिरने के बाद राज्य की राजनीति विशेष रूप से आकर्षक हो गई, जिसके कारण एक दशक तक कोई भी मुख्यमंत्री पूरे तीन साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। बिहार में पहली सरकार 1946 में श्री कृष्ण सिन्हा के नेतृत्व में बनी थी। वे 1961 में अपनी मृत्यु तक मुख्यमंत्री रहे।

Bihar Political

कांग्रेस नेतृत्व संघर्ष: श्री कृष्ण सिन्हा के लंबे कार्यकाल के बावजूद, कांग्रेस के भीतर अंदरूनी राजनीति, खास तौर पर जातिगत आधार पर, सतह के नीचे उबलती रही। सिन्हा के निधन के बाद यह अंदरूनी कलह और भी स्पष्ट हो गई, जिसके कारण नेतृत्व में कई तीव्र परिवर्तन हुए।

श्री कृष्णा सिन्हा की मृत्यु के बाद ब्राह्मण वर्ग से बिनोदानंद झा, कायस्थ समुदाय से केबी सहाय और भूमिहार एमपी सिन्हा के बीच नेतृत्व के लिए भीषण संघर्ष हुआ। इस अंतर्कलह ने कांग्रेस को काफी कमजोर कर दिया। शुरुआत में सिन्हा के उत्तराधिकारी के रूप में दीप नारायण सिंह को चुना गया, लेकिन बढ़ते आंतरिक संघर्ष के कारण उन्होंने महज 17 दिनों के बाद ही इस्तीफा दे दिया।

बीएन झा पर भरोसा: बीएन झा अंततः कांग्रेस के भीतर विजयी हुए और 1961 में मुख्यमंत्री की भूमिका निभाई। हालाँकि, उनका कार्यकाल अल्पकालिक था क्योंकि उन्होंने ढाई साल बाद पद छोड़ दिया। इसके बाद हाईकमान ने कायस्थ नेता कृष्ण बल्लभ सहाय को सीएम नियुक्त किया, जिन्होंने पार्टी के शेष कार्यकाल के लिए काम किया।

कांग्रेस युग के बाद राजनीतिक उथल-पुथल: 1967 में कांग्रेस के पतन के बाद बिहार में अस्थिरता का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस की हार के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। खुद कायस्थ समुदाय से आने वाले महामाया प्रसाद ने पहले श्री कृष्ण सिन्हा से मतभेद के कारण कांग्रेस छोड़ दी थी और अपनी अलग पार्टी जन क्रांति दल बनाई थी।

महामाया प्रसाद के सत्ता में आने की कहानी दिलचस्प है। 1967 के चुनावों में उन्होंने पटना पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र से तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय को सीधे चुनौती दी और निर्णायक रूप से जीत हासिल की। उनकी जीत ने उस दौर में बिहार में बदलती राजनीतिक गतिशीलता को उजागर किया।

बिहार में राजनीतिक अस्थिरता: 1967 से 1971 तक बिहार में ऐसी राजनीतिक अस्थिरता रही कि तीन बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। इस दौरान एक नेता तो मात्र 16 विधायकों के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गया, जबकि दूसरा केवल चार दिन ही पद पर रहा। ये घटनाएँ उन वर्षों के दौरान बिहार की राजनीति की उथल-पुथल को रेखांकित करती है।

नेतृत्व में लगातार बदलाव उस समय बिहार के राजनीतिक ढांचे के भीतर गहरे मुद्दों का संकेत थे। राज्य के इतिहास में ऐसे दौर दर्ज हैं जब नेताओं को गुटबाजी और बदलते गठबंधनों के बीच सत्ता बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

बिहार की राजनीतिक यात्रा इसके जटिल सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने को दर्शाती है और इस बात पर प्रकाश डालती है कि ऐतिहासिक घटनाओं ने इसके वर्तमान परिदृश्य को कैसे आकार दिया है। इन अतीत की गतिशीलता को समझने से बिहार की वर्तमान राजनीति और इसके चल रहे विकास के बारे में जानकारी मिलती है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+