Bihar Chunav 2025: बिहार चुनाव से पहले 'नीतीश की तबीयत' पर सियासत क्यों? हेल्थ को मुद्दा क्यों बना रही है RJD
Bihar Chunav 2025 (Nitish Kumar): बिहार की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुकी है। एक ओर हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो दशकों से सत्ता में बने हुए हैं, और दूसरी तरफ है विपक्षी पार्टी महागठबंधन (RJD+कांग्रेस और अन्य), जो अब उनके ''स्वास्थ्य और व्यवहार'' को चुनावी मुद्दा बनाने में जुट गया है। लेकिन इसी सियासी गहमागहमी के बीच बीजेपी ने साफ कर दिया है कि आने वाले चुनाव में NDA का सीएम चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। लेकिन फिर भी सीएम नीतीश कुमार की सेहत को लेकर विपक्ष बार-बार सवाल उठा रहा है।
हाल ही के एक वायरल वीडियो में सीएम नीतीश को राष्ट्रगान के दौरान मुस्कराते और बात करते देखा गया। एक अन्य कार्यक्रम में महिला के कंधे पर सीएम नीतीश हाथ रखते दिखे। ऐसे कुछ मौके मिले जिसपर RJD ने तीखा हमला बोला। तेजस्वी यादव और कांग्रेस पार्टी का कहना है-"नीतीश अब मानसिक और शारीरिक रूप से अस्थिर हैं, और उन्हें रिटायर हो जाना चाहिए।" तेजस्वी यादव तो इतना तक कह चुके हैं कि ''नीतीश बस नाम के सीएम हैं, सरकार कोई और चला रहा है।'' लेकिन यहां आपको समझना होगा कि पूरे नैरेटिव के पीछे गहरी राजनीतिक रणनीतियां छुपी हैं-और इनमें से कोई भी जनता के मुद्दों पर नहीं है, बल्कि सिर्फ "धारणा गढ़ने की कोशिश" है।

🔴 पहला एजेंडा: RSS का हवाला, दलित वोटों पर नजर
महागठबंधन यानी विपक्षी पार्टी ये जानता है कि नीतीश कुमार अब भाजपा के साथ NDA में हैं, और भाजपा के साथ होने का मतलब है
RSS की छाया में होना। इसलिए विपक्ष यह छवि बनाना चाहता है कि RSS और सवर्ण-हित वाली राजनीति बिहार में फिर से मजबूत हो रही है। इसीलिए बार-बार नीतीश की "कमजोर सेहत" को लेकर यह मैसेज दिया जा रहा है कि वे अब फैसले लेने में सक्षम नहीं, और असल में सरकार कोई और चला रहा है।
इसका मकसद है दलित-पिछड़े वोट बैंक को यह यकीन दिलाना कि नीतीश अब उनके प्रतिनिधि नहीं हैं। ताकि आने वाले चुनाव में दलित वोटबैंक में असर पड़े। RJD की कोशिश है कि OBC, EBC, दलित और मुस्लिम वोटर्स को यह यकीन दिलाया जाए कि नीतीश की गैरहाजिरी में भाजपा की विचारधारा हावी है। यह एक बड़ा चुनावी नैरेटिव बनाने की कोशिश है।
🔴 दूसरा एजेंडा: विकास के मुद्दे पर नीतीश को घेर पाना असंभव
नीतीश कुमार 2005 से अब तक बिहार के सबसे सफल और स्थिर मुख्यमंत्री रहे हैं। RJD जानती है कि नीतीश कुमार अब भी बिहार की राजनीति में सबसे अनुभवी और विश्वसनीय चेहरा हैं। उनकी गुड गवर्नेंस की छवि और विकास के कामों की लिस्ट लंबी है
2005 में जब वे सीएम बने, तब बिहार की बिजली पहुंच 22% से भी कम थी, आज यह 95% से ऊपर है। पटना मेट्रो से लेकर हर जिले में मेडिकल कॉलेज की पहल से लेकर गांवों तक सड़कों का जाल और हर घर नल-जल योजना, शराबबंदी, महिलाओं को आरक्षण...ऐसे कई विकास के काम बिहार में नीतीश कुमार ने किए हैं। इन सबने उन्हें विकास के चेहरे के तौर पर स्थापित किया है।
यही वजह है कि RJD और कांग्रेस विकास या शासन की आलोचना नहीं कर सकते, तो उन्होंने नीतीश की उम्र और तबीयत को मुद्दा बना लिया है। उन्हें पता है कि RJD के शासन के दौरान बिहार की क्या स्थिति थी इसलिए विकास के मुद्दे पर वो नीतीश कुमार को काउंटर नहीं कर सकते हैं।
दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर भी लोग तर्क दे रहे हैं कि अगर उम्र और बीमारी से सरकार चलाना मुश्किल है, तो फिर लालू यादव भी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, लेकिन अभी भी वो पार्टी के अहम फैसले लेते हैं। सोनिया गांधी भी हेल्थ इश्यू के बावजूद UPA की सबसे अहम नेता रही हैं। आज भी वो कांग्रेस में निर्णायक भूमिका में हैं।
ऐसे में काम और विकास पर नीतीश को हराना मुश्किल है। इसलिए वे हेल्थ जैसे "इमोशनल नैरेटिव" पर खेल रहे हैं, ताकि लोगों के मन में यह धारणा बैठाई जा सके कि "अब वे सरकार चलाने लायक नहीं हैं।"
🔴 लेकिन क्या वास्तव में फिट हैं मुख्यमंत्री?
फरवरी 2025 में हुए 'प्रगति यात्रा' के दौरान नीतीश कुमार पूरी तरह सक्रिय दिखे-21 उत्तरी बिहार जिलों में दौरे किए, योजनाओं की समीक्षा की और कार्यों की निगरानी की। ये बताते हैं कि वे पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त और सशक्त स्थिति में हैं। उन्होंने अधिकारियों को सख्ती से फटकार भी लगाई-जिससे उनकी लेडरशिप और निर्णय क्षमता स्पष्ट दिखाई दी।
🔴 भाजपा के लिए क्यों जरूरी है नीतीश कुमार?
✅ बिहार की राजनीति में हिंदुत्व का असर सीमित है-यहां कास्ट समीकरण और गठबंधन की अहमियत है। बिहार में जातीय सर्वे से पता चला कि बिहार की आबादी में OBC + EBC का हिस्सा 63%, और विशेष रूप से EBC (36%) व्यापक वोट आधार बनाए हुए हैं। नीतीश कुमार, जो स्वयं एक कुर्मी नेता हैं, इस वोट बैंक का भार लेकर चलते हैं और भाजपा को भी इससे राजनीतिक लाभ मिलता है।
✅भाजपा जानती है कि अगर वे अकेले चुनाव लड़ेंगे तो जीत मुश्किल होगी-इसीलिए वे नीतीश कुमार को गठबंधन में बनाए रखना चाहती है। अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि हालांकि वे नीतीश को 'लाडला मुख्यमंत्री' कहते हैं, लेकिन अभी तक कोई सीएम चेहरा घोषित नहीं हुआ है, जो दोनों दलों के लिए "स्टैंडिंग पार्टी?" का संकेत दे रहा है।
अब चुनाव 2025 में यह देखना रोचक होगा कि-बिहार की जनता इस 'फिटनेस फाइट' को कैसे परखती है और क्या यह रणनीतिक गणित बदलाव लाएगा?












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