Bihar Election: ओवैसी गठबंधन के लिए राजी लेकिन लालू यादव क्यों नहीं दे रहे AIMIM को भाव, यहां फंसा है पेंच

Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सभी दल अपनी तैयारियों में व्यस्त हैं। इस बार एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला नहीं है। प्रशांत किशोर की पार्टी भी मैदान में है। पुष्पम प्रिया से लेकर पूर्व आईपीएस शिवदीप वामन लिंडे जैसे चर्चित चेहरे भी हैं। हालांकि, मुख्य मुकाबला इंडिया अलायंस और एनडीए के बीच ही है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी सीमांचल की सीटों पर मैदान में है। ओवैसी की पार्टी इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने में दिलचस्पी दिखा रही है। अब तक उन्हें न आरजेडी (RJD) और न कांग्रेस की ओर से ही सकारात्मक जवाब मिला है।

AIMIM के बिहार अध्यक्ष और अमौर से विधायक अख्तरुल इमान ने कहा है कि उनकी पार्टी महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने (Bihar Election) के लिए तैयार है। एआईएमआईएम ने शर्त रखी है कि वह सीमांचल (पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, कटिहार) की प्रमुख सीटें उनकी पार्टी को मिलें। असदुद्दीन ओवैसी ऑल पार्टी डेलिगेशन में शामिल थे और अब विदेश से भारत लौट गए हैं। हालांकि, एआईएमआईएम के ऑफर पर अब तक आरजेडी या कांग्रेस की ओर से कोई जवाब नहीं आया है।

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लालू यादव क्यों ओवैसी के साथ नहीं जाना चाहते?

साल 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल क्षेत्र की 5 सीटों- अमौर, कोचाधामन, जोकीहाट, बैसी और बहादुरगंज की सीटों पर जीत दर्ज की थी। चुनाव नतीजे साफ संकेत दे रहे थे कि लालू यादव और आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक में ही सेंध लगी है। ओवैसी की पार्टी का मुख्य वोट बैंक सीधे तौर पर मुस्लिम वर्ग है। बिहार में आरजेडी का पारंपरिक वोटर यादवों और मुस्लिमों को माना जाता है। ऐसे में आरजेडी और कांग्रेस के सामने दो संकट हैं। पहली है कि ओवैसी सीमांचल की मुस्लिम बहुल सीटें मांगेंगे। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी 8 सीटें मांग रही है जबकि इंडिया गठबंधन उन्हें इतनी सीटें देने पर राजी नहीं होगी।

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हिंदू वोट का हो सकता है ध्रुवीकरण

दूसरी समस्या यह है कि असदुद्दीन ओवैसी के कांग्रेस के साथ सहज संबंध नहीं रहे हैं। ओवैसी कई बार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर हमला बोलते रहे हैं। उन पर राहुल और कांग्रेस के कई नेता बीजेपी की बी पार्टी होने का आरोप लगाते रहे हैं। लालू यादव के सामने दूसरी असमंजस की स्थिति यह है कि तेजस्वी यादव आरजेडी को समावेशी पार्टी बनाने की बात कर रहे हैं और इसमें महिलाओं+युवाओं को जोड़ने की बात कहते हैं। ओवैसी के साथ जाने पर हिंदू वोटों के भी ध्रवीकरण की आशंका है। इन दोनों पहलू को समझते हुए एआईएमआईएम से गठबंधन में कभी आरजेडी की तरफ से ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखाई गई है।

गठबंधन नहीं भी हुआ तो ओवैसी के लिए घाटे का सौदा नहीं

असदुद्दीन ओवैसी के लिए इस वक्त दोनों ही स्थितियां ठीक हैं। गठबंधन होने पर उम्मीद है कि उन्हें 5-7 सीटें मिल जाएंगी जहां से उनकी पार्टी के उम्मीदवार जीत दर्ज कर सकते हैं। गठबंधन नहीं होने की स्थिति में भी वह अपने उम्मीदवार उतारेंगे ही। चुनाव प्रचार के दौरान उनके पास बीजेपी के साथ ही इंडिया गठबंधन पर भी हमला करने का मौका होगा। वह जनता के सामने इस आधार पर सहानुभूति बटोरेंगे कि इंडिया अलायंस मुस्लिम हितों का दिखावा करती है। हकीकत में वह उन्हें नेतृत्व की भूमिका में नहीं देखना चाहती है। हालांकि, अभी बिहार चुनाव में कुछ महीनों का वक्त है और तब तक राजनीतिक घटनाक्रमों को बदलते रहना जारी रहेगा।

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