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Bihar Election 2025 Opinion Poll: बिहार चुनाव पर चौंकाने वाले 4 ओपिनियन पोल, नीतीश रचेंगे 2010 जैसा इतिहास?

Bihar Election 2025 Opinion Poll: बिहार की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या एनडीए 2025 में फिर से इतिहास रच सकता है? हाल ही में जारी हुए चार अलग-अलग ओपिनियन पोल्स ने इस सवाल को और दिलचस्प बना दिया है। इन चारों सर्वेक्षणों मैट्रिक्स, जेवीसी ओपिनियन पोल, स्पीक मीडिया नेटवर्क और वोट वाइब का एक ही इशारा है कि इस बार बिहार में एनडीए की स्थिति मजबूत है, जबकि महागठबंधन को पिछली बार की तुलना में कठिन चुनौती झेलनी पड़ सकती है।

🔹 एनडीए का बढ़ता ग्राफ, 40 से 52% तक वोट शेयर का अनुमान

इन सर्वेक्षणों के मुताबिक, एनडीए को 40% से 52% तक वोट शेयर और 130 से 158 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। यह 2020 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले बड़ा उछाल है, जब एनडीए को सिर्फ 37.26% वोट और 125 सीटें मिली थीं। एनडीए की इस मजबूत स्थिति के पीछे एक बड़ा कारण माना जा रहा है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नेतृत्व, भाजपा-जदयू की तालमेल वाली रणनीति और विपक्षी खेमे की बिखरती स्थिति।

Bihar Election Opinion Poll 2025

🔹 मैट्रिक्स सर्वे: नीतीश के काम से 76% जनता संतुष्ट

मैट्रिक्स सर्वे के नतीजे नीतीश कुमार के पक्ष में गए हैं। इस सर्वे में 76% लोगों ने मुख्यमंत्री के कामकाज से संतुष्टि जताई, जिसमें 40% "बहुत संतुष्ट" और 36% "संतुष्ट" रहे।

जब जनता से पूछा गया कि बिहार में कौन सी पार्टी अच्छा शासन दे सकती है, तो 35% ने बीजेपी और 18% ने जदयू का नाम लिया। यानी कुल 43% लोगों का भरोसा एनडीए पर है।

सबसे अहम बात यह कि 20 साल से सत्ता में रहने के बावजूद 42% लोग आज भी नीतीश कुमार को सीएम के रूप में देखना चाहते हैं। अगर आज चुनाव हों, तो 52% लोग एनडीए को वोट देंगे - यह वही आंकड़ा है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि 2010 में 39% वोट शेयर के साथ एनडीए ने 206 सीटें जीती थीं।

🔹 JVC ओपिनियन पोल: नीतीश अब भी 'पहली पसंद'

जेवीसी ओपिनियन पोल में भी एनडीए के पक्ष में हवा नजर आई। इस सर्वे के अनुसार, एनडीए को 41-45% वोट शेयर और 131-150 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं, आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन को 40% वोट और 81-103 सीटें मिल सकती हैं। दिलचस्प बात यह रही कि जन सुराज को 10-11% वोट और 4-6 सीटें मिल सकती हैं।

जब सीएम के चेहरे की बात आई तो 27% लोगों ने नीतीश कुमार को अपनी पहली पसंद बताया, जबकि तेजस्वी यादव 25% पर दूसरे स्थान पर रहे। यह नतीजे साफ बताते हैं कि लंबे शासन के बावजूद नीतीश की स्वीकार्यता में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई है।

🔹 स्पीक मीडिया नेटवर्क सर्वे: एनडीए को 158 सीटों तक का अनुमान

स्पीक मीडिया नेटवर्क के सर्वे में तो एनडीए की स्थिति और भी मजबूत दिखाई गई है। इस सर्वे के अनुसार, एनडीए को 46% वोट शेयर के साथ 158 सीटें मिल सकती हैं, जबकि महागठबंधन को 41% वोट शेयर के साथ 66 सीटों तक सीमित बताया गया है। जन सुराज को 8% वोट मिलने का अनुमान है, लेकिन सीट शून्य बताई गई है।

वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) को इस सर्वे में चार सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। यह सर्वे एनडीए के लिए सबसे उत्साहजनक रहा, जबकि जन सुराज और महागठबंधन दोनों के लिए यह चेतावनी की घंटी साबित हो सकता है।

🔹 वोट वाइब सर्वे: महिलाओं की योजना पर जनता का रुख

वोट वाइब सर्वे थोड़ा अलग दिशा में गया। इसने सीधे वोट शेयर पर नहीं बल्कि महागठबंधन की महिला रोजगार योजना (10,000 रुपये सहायता) पर जनता की प्रतिक्रिया मापी। करीब 34.9% लोगों ने कहा कि वे महागठबंधन को वोट देंगे, जबकि 34.8% ने एनडीए का समर्थन किया।

दिलचस्प बात यह रही कि 5.8% लोग, जो पहले महागठबंधन या जन सुराज के समर्थक थे, उन्होंने कहा कि वे अब एनडीए की योजनाओं की वजह से भाजपा-जदयू गठबंधन को वोट देंगे। इससे संकेत मिलता है कि एनडीए का वोट शेयर 40% से ऊपर जा सकता है - यानी मुकाबला कांटे का लेकिन झुकाव सत्ता पक्ष की ओर।

🔹 क्या 2025 बनेगा "परिवर्तनकारी चुनाव"?

इन चारों सर्वेक्षणों का सम्मिलित विश्लेषण बताता है कि एनडीए को 130-158 सीटें और 40-52% वोट शेयर मिल सकते हैं, जबकि महागठबंधन 66-103 सीटों तक सीमित रह सकता है। राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव को बिहार के लिए "परिवर्तनकारी चुनाव" कह रहे हैं। दरअसल, यह सिर्फ सत्ता की वापसी की लड़ाई नहीं है, यह भविष्य के नेतृत्व, गठबंधन समीकरण और जनता के विश्वास की दिशा तय करेगा।

चारों ओपिनियन पोल्स के बाद साफ संकेत मिल रहे हैं कि बिहार में एनडीए का ग्राफ ऊपर जा रहा है। नीतीश कुमार का शासन अनुभव, भाजपा का संगठन, और विपक्ष की बिखरी रणनीति मिलकर एनडीए को बढ़त दिला रही है। हालांकि, अंतिम फैसला नवंबर 2025 में जनता के वोट से ही तय होगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार का चुनाव बिहार की राजनीति का चेहरा बदल सकता है और शायद 2010 जैसा इतिहास फिर दोहराया जाए।

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