Begusarai Lok Sabha Seat: महागठबंधन की तरफ़ से अगर कन्हैया होते उम्मीदवार, तो दिलचस्प होता मुकाबला
Begusarai Lok Sabha Seat Ground Report: बिहार की 40 सीटों में बेगूसराय लोकसभा सीट सुर्खियों में बनी हुई है। साल 2019 के चुनाव में यहां से भाजपा के फ़ायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह और सीपीआई के कन्हैया कुमार (जो कि अब कांग्रेस नेता है) ने चुनावी ताल ठोकी थी। हालांकि उस चुनाव में गिरिराज सिंह ने काफी मतों के अंतर से कन्हैया कुमार को हराया था।
2019 के लोकसभा चुनाव में राजद और सीपीआई अलग-अलग चुनावी मैदान में थी। राजद की तरफ़ से तनवीर हसन ने चुनावी ताल ठोकी थी। भाजपा नेता गिरिराज सिंह को बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से 6 लाख 92 हज़ार 193 मत मिले।

वहीं दूसरे नंबर सीपीआई के कन्हैया कुमार को 2 लाख 69 हज़ार 976 वोट मिले थे। इसके अलावा राजद के तनवीर हसन को 1 लाख 98 हज़ार 233 वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। गिरिराज सिंह के वोटों का अंतर इतना ज्यादा था कि सीपीआई और राजद के वोट मिला लेने के बाद भी गिरिराज सिंह के आंकड़े को नहीं छू पाये।
2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से गिरिराज सिंह एनडीए की तरफ़ से उम्मीदवार हैं। वहीं महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वामदल) की तरफ़ से सीपीआई नेता अवधेश राय को उम्मीदवार बनाया गया है। उम्मीदवारों को लेकर मतदाताओं के बीच माहौल जानने वन इंडिया हिंदी की टीम ग्राउंड पर पहुंची।
बेगूसराय लोकसभा सीट के मतदाताओं से विभिन्न पहलुओं पर बात की। इसी क्रम में महागठबंधन के उम्मीदवार पर बात करते हुए लोगों ने कहा कि इस बार भी कन्हैया कुमार को ही उम्मीदवार बनाना चाहिए था। भले ही कन्हैया ने पार्टी बदल ली लेकिन एक ही गठबंधन के हिस्सा थे।
अवधेश राय के मुकाबले में कन्हैया कुमार ज्यादा बेहतर उम्मीदवार साबित होते और महागठबंधन के खाते में बेगूसराय सीट आसानी से आ जाती। इसके पीछ सबसे बड़ी वजह गिरिराज सिंह को लेकर लोगों में खासी नाराज़गी है। इसके अलावा एनडीए नेता और कार्यकर्ता भी खिलाफ हैं।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने पुत्र मोह में महागठबंधन में सीट बंटवारे में धांधली की है। जहां-जहां कांग्रेस की दावेदारी थी वहां-वहां पहले ही राजद ने सिम्बॉल बांट दिए। बेगूसराय सीट कांग्रेस को इसलिए नहीं दिया क्योंकि कन्हैया उम्मीदवार हो जाते। कांग्रेस के साथ गठबंधन की वजह से कन्हैया आसानी से जीत दर्ज कर लेते।
कन्हैया के जीत दर्ज करते ही युवाओं में तेजस्वी से ज्यादा लोकप्रिय नेता कन्हैया कुमार होने लगते। इसलिए राजद ने गठबंधन धर्म को किनारा करते हुए सीपीआई के बहाना कर कांग्रेस को टिकट नहीं दिया। वहीं पूर्णिया सीट भी इसलिए नहीं दिया क्योंकि वहां से पप्पू यादव उम्मीदवार होते और गठबंधन में होने की वजह आसानी से जीत दर्ज होती।
पप्पू यादव के जीतने के साथ ही राजद की यादव वोट बैंक की सियासत डगमगा जाती। इसलिए लालू और तेजस्वी ने खेल करते हुए बिना सीट बंटवारे के ही पहले ही जदयू से राजद में शामिल हुई बीमा भारती को टिकट दे दिया ताकि पप्पू यादव चुनाव ही नहीं लड़ पाये। राजद ने गठबंधन धर्म को नहीं निभाया है। इस वजह से मतदाताओं में विभिन्न सीटों पर बिखराव देखने को मिलेगा।












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