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बिहार के इस ज़िले में है 158 साल पुरानी बाघ की समाधि, विदेश से श्रद्धांजलि देने आते हैं लोग

bagh ki samadhi: बिहार के मुंगेर जिला में बनी बाघ की समाधि की पूरे देश में चर्चा है। इतिहासकार की मानें तो पहली बार बिहार में एक अंग्रेज थॉमस राबर्ट ने बाघ का शिकार 1864 में किया था। वह रेल कारखाना जमालपुर फोरमैन थे।

बिहार में आदमखोर बाघ के अंत के बाद प्रदेश में बाघ से जुड़े कई किससे सामने आ चुके हैं। वहीं आज हम आपको इतिहास से जुड़ा बाघ का किस्सा सुनाने जा रहे हैं। बिहार में पहली बार बाघ की समाधी 158 साल पहले बनाई गई थी और आज भी उस समाधी पर लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। जानकार बताते हैं कि देश को आज़ादी मिलने से 83 साल पहले आदमखोर बाघ की समाधी बनाई गई थी। आइए विस्तार से जानते हैं कि बाघ की समाधि क्यों बनाई गई और आज भी लोग उसे श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

थॉमस राबर्ट ने 1864 में किया था बाघ का शिकार

थॉमस राबर्ट ने 1864 में किया था बाघ का शिकार

बिहार के मुंगेर जिला में बनी बाघ की समाधि की पूरे देश में चर्चा है। इतिहासकार की मानें तो पहली बार बिहार में एक अंग्रेज थॉमस राबर्ट ने बाघ का शिकार 1864 में किया था। वह रेल कारखाना जमालपुर फोरमैन थे। उनकी पत्नि एलिजा 13 जून 1864 की सुबह गोल्फ ग्राउंड में टहल रही थी। इसी दौरान बाघ ने उनपर हमला कर दिया था।

बाघ के हमले से जख्मी हुए थॉमस की मौत

बाघ के हमले से जख्मी हुए थॉमस की मौत

एलिजा ने मदद के लिए आवाज़ लगाई तो थॉमस बंदूक लेकर बाघ की तरफ कूद पड़े। वहीं थॉमस के हाथों से बंदूक छूट गई और बाघ ने पंजे और दांतों से उनपर पर हमला कर दिया। वहीं थॉमस ने हिम्मत जुटाते हुए बंदूक उठाई और बाघ को मार गिराया। थॉमस की बंदूक से बाघ तो मारा गया लेकिन बाघ के हमले से जख्मी हुए थॉमस ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया।

विदेशों से श्रद्धांजलि देने आज भी आते हैं लोग

विदेशों से श्रद्धांजलि देने आज भी आते हैं लोग

थॉमस और बाघ की मौत के बाद अंग्रेजी अधिकारियों ने जमालपुर काली पहाड़ी के नीचे गोल्फ ग्राउंड में दोनों की कब्र बनाई। इतिहासकार बताते हैं कि बिहार में देश की पहली बाघ की समाधि मुंगेर में ही बनाई गई थी। बाघ औऱ थॉमस की समाधि आस पास में ही है। इसका ज़िक्र बाबा आनंदमूर्ति (संस्थापक, आनंदमार्ग) से जुड़ी कई किताबों मं है। प्रभात रंजन सरकार (आनंदमूर्ति बाघ) की कब्र पर साधना करते थे तो थॉमस राबर्ट की वारिस फ्रेया कब्र पर श्रद्धांजलि देने आती थी। आज भी विदेशों से लोग रॉबर्ट की कब्र पर समाधि देने आते हैं।

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