Bhopal News: विदेशी मामा ने भांजे को किडनी देकर बचाई जान, प्रदेश में पहली बार हुआ है ऐसा ट्रांसप्लांट
भोपाल में जरूरत पड़ने पर मामा ने विदेश से लौटकर अपने भांजे को किडनी देकर उसको नई जिंदगी दी है।

राजधानी में मामा और भांजे के पवित्र रिश्ते का सामाजिक उदाहरण देखने को मिला है। कहते है कि बुरे वक्त में अपने ही काम आते हैं, ऐसा एक मामला राजधानी भोपाल से सामने आया है। जहां पर विदेश में रह रहे मामा ने जरूरत पड़ने पर भोपाल लौटकर अपने भांजे को किडनी देकर उसकी जान बचाई।
क्या है पूरा मामला
दरअसल भोपाल के कोलार में रहने वाले आशुतोष गुप्ता एक बैंक कर्मचारी है। उन्होंने बताया कि सितंबर 2019 में उनको किडनी की समस्या हो गई थी। जिसके बाद से उनका लगातार डायलिसिस जारी था। लंबे समय से सोच रहे थे कि कोई उन्हें किडनी दान कर दे। उनके करीबी लोगों में मां समेत कई लोगों ने किडनी देने के लिए सोचा, लेकिन उनकी रिपोर्ट ठीक नहीं आई। इसके बाद उन्होंने अपने मामा विनय थवाइट से बात की और मामा ने उन्हें किडनी देने का फैसला किया। आशुतोष ने बताया कि उनका बचपन से मामा से बड़ा स्नेह रहा है।
बीमारी के बारे में पता चलते ही मामा ने किया फैसला
विनय थवाइट ने बताया कि उन्हें भांजे आशुतोष ने जैसी अपनी बीमारी के बारे में बताया उन्होंने तुरंत किडनी डोनेट करने का फैसला कर लिया इसके लिए उनकी दोनों बेटियों और उनकी पत्नी ने उन्हें काफी प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी भी आशुतोष को किडनी देने के लिए तैयार हो गई थी, लेकिन उनकी रिपोर्ट्स ठीक है और उन्होंने ट्रांसप्लांट का फैसला किया। विनय ने बताया कि उनका हॉस्पिटल एक्सपीरियंस तो अच्छा रहा, लेकिन डॉक्यूमेंटेशन में बहुत समय लगा। इसे और आसान बनाया जा सकता है।
कौन है विनय थवाइट
आशुतोष ने बताया कि उनके मामा विनय थवाइट 60 वर्षीय है और उन्होंने 1982 में भोपाल में पहली बार कराटे को इंट्रोड्यूस करवाया। मामा कराटे में ब्लैक बेल्ट चैंपियन भी रहे। करीब 1990 तक वे कराटे में एक्टिव रहे। इसके बाद यूके में जाकर कराटे में एक्टिव हो गए। उसके बाद से साल 2010 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में सब्जेक्ट एडवाइजर हैं।
प्रदेश में पहली बार हुआ है ऐसा ट्रांसप्लांट
डॉक्टर वी त्रिपाठी ने बताया कि मध्यप्रदेश में ऐसा ट्रांसप्लांट पहली बार हुआ है, जब किसी ने विदेश से आकर अपनी किडनी डोनेट की हो। उन्होंने बताया कि आशुतोष गुप्ता लंबे समय से डायलिसिस पर थे। हमने उन्हें ट्रांसप्लांट की सलाह दी थी, मगर उनके परिवार में कोई भी सक्षम नहीं था, जो किडनी दे पाए। इसी बीच उनके एक मामा जो कि 30 साल से यूके में सेटल है। उनको जैसे ही पता चला, उन्होंने किडनी डोनेट करने के लिए मन बना लिया। उन्होंने अपना टेस्ट करवाया। साथ ही यूके एंबेसी से एनओसी भी ली। इसके बाद ह्यूमन ऑर्गन अथॉरिटी परमिशन के बाद यह सफल ट्रांसप्लांट किया गया है।












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