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MP news: किसानों की महाविजय, जानिए लैंड पूलिंग की कैसे निकली अर्थी, सिंहस्थ की जमीन बच गई!

उज्जैन में सिंहस्थ, 2028 की तैयारियों के नाम पर पिछले पांच साल से चल रहा किसानों का सबसे बड़ा आंदोलन सोमवार देर रात अचानक विजय में बदल गया जब मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों के साथ दो घंटे की मैराथन बैठक के बाद लैंड पूलिंग योजना को उज्जैन के लिए पूरी तरह वापस लेने की घोषणा कर दी।

जैसे ही यह खबर उज्जैन पहुंची, रात के ढाई बज रहे थे, लेकिन पूरा शहर जाग उठा; किसान ट्रैक्टर-ट्रालियों में सवार होकर सड़कों पर निकल आए, आतिशबाजी की आवाजें गूंजने लगीं, ढोल-मंजीरे बज उठे, लोग एक-दूसरे को मिठाई खिला रहे थे। किसानों ने सिंहस्थ क्षेत्र की पवित्र क्षिप्रा तट की मिट्टी हाथ में ली, "भूमि माता की जय" के नारे लगाए और भूमि देवी मंदिर में मिट्टी अर्पित की।

Land pooling scheme for Simhastha 2028 suddenly withdrawn Farmers celebrate in Ujjain

इसके बाद सैकड़ों किसान कलेक्टर कार्यालय के बाहर जमा हो गए और देर रात तक जश्न मनाते रहे। कई बुजुर्ग किसान आंसुओं के साथ कह रहे थे, "हमारी जमीन बच गई, हमारी आने वाली पीढ़ी अब भिखारी नहीं बनेगी।"

हालांकि यह जश्न अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि भोपाल से कांग्रेस ने तीखा हमला बोल दिया। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर तराना विधायक महेश परमार और उज्जैन शहर कांग्रेस अध्यक्ष मुकेश भाटी ने सरकार पर सवालों की बौछार कर दी।

दोनों नेताओं ने पूछा कि जिस लैंड पूलिंग योजना को विधानसभा में भाजपा सरकार ने "किसान हितैषी" और "सिंहस्थ के लिए जरूरी" बताकर बहुमत के बल पर पास कराया था, उसी योजना को अब रातोंरात "गलत" कैसे मान लिया गया? क्या सिर्फ भारतीय किसान संघ के दबाव में झुक गए या उज्जैन के हजारों किसानों के पांच साल के आंदोलन का भी कोई असर हुआ? क्या यह वापसी सिर्फ उज्जैन तक सीमित रहेगी या पूरे मध्यप्रदेश में लागू यह काला कानून खत्म किया जाएगा? कांग्रेस ने इसे "डर के मारे लिया गया अस्थायी फैसला" करार देते हुए कहा कि जब तक पूरे प्रदेश से लैंड पूलिंग एक्ट खत्म नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

दरअसल, सरकार ने सिंहस्थ, 2028 के लिए क्षिप्रा तट पर स्थायी निर्माण की बड़ी योजना बनाई थी, जिसमें उज्जैन के 19 गांवों की करीब 2378 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन लैंड पूलिंग के जरिए लेने का प्रावधान था। इस योजना के तहत किसानों की सहमति के बिना भी जमीन ली जा सकती थी, मुआवजा सरकार तय करती और किसान को सिर्फ 30-40 प्रतिशत विकसित जमीन ही वापस मिलती।

पिछले पांच साल से किसान, कांग्रेस और कई सामाजिक संगठन इसका लगातार विरोध कर रहे थे। आंदोलन इतना तेज हो गया था कि सिंहस्थ क्षेत्र को कई बार छावनी में बदल दिया गया था, किसानों को महाकाल दर्शन तक से रोका गया था। आखिरकार सोमवार रात को भारतीय किसान संघ के भारी दबाव के बाद मुख्यमंत्री को झुकना पड़ा और घोषणा करनी पड़ी कि उज्जैन के लिए लैंड पूलिंग योजना पूरी तरह वापस ली जाती है।

अब उज्जैन में जश्न का माहौल है तो भोपाल में सियासी घमासान शुरू हो गया है। एक तरफ किसान इसे अपनी पांच साल की लड़ाई की जीत बता रहे हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस पूछ रही है कि जब योजना इतनी अच्छी थी तो रातोंरात वापस क्यों? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिंहस्थ की तैयारियां अब बिना जमीन के कैसे होंगी और पूरे मध्यप्रदेश में अभी भी लागू लैंड पूलिंग एक्ट कब तक किसानों के सिर पर लटकता रहेगा? उज्जैन ने राह दिखा दी है, अब देखना यह है कि पूरे प्रदेश के किसानों को यह न्याय कब मिलेगा।

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