Dussehra 2022 : MP के सतना जिले में होती है दशहरा के दिन रावण की पूजा, जानें खास परंपरा

सतना, 4 अक्टूबर। दशहरा का त्योहार पांच अक्टूबर को पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाएगा। विजयदशमी का त्यौहार धर्म की अधर्म पर जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय हासिल की थी। उसके बाद माता सीता को मुक्त करवा कर अयोध्या वापस लेकर लौटे थे। जिसके बाद से दशहरा के दिन प्रतिवर्ष रावण के पुतले का दहन किया जाता है। हालांकि भारत में कई ऐसे स्थल हैं जहां पर लोग आज भी रावण के पुतले का दहन नहीं करते हैं, वहां पर उसकी पूजा की जाती है। मध्य प्रदेश के सतना जिले में भी रावण की प्रतिमा हैं और यहां पर उसके पुतले का दहन नहीं किया जाता है। यहां पुतले की नहीं बल्कि प्रतिमा की पूजा होती है। यहां की मान्यता है कि यह प्रतिमा 300 वर्ष से भी ज्यादा पुरानी है।

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    ऐसी है मान्यता

    ऐसी है मान्यता

    रावण के पुजारी पंडित रमेश मिश्रा ने जानकारी देते हुए बताया कि कोठी रियासत के राजा सीता रमण सिंह जूदेव द्वारा 300 सौ वर्ष पहले कोठियार नदी के मैदान पास "वर्तमान में पुलिस थाना मैदान" रावण की मूर्ति बनवाई गई थी। ठीक सामने ही भगवान श्रीराम का चबूतरा का भी निर्माण कराया गया था। जहां रामलीला का आयोजन किया जाता था। रामलीला आयोजन के दौरान दशहरा के दिन भगवान श्रीराम द्वारा चबूतरे से रावण पर बाण चलाया जाता था। रामलीला को देखने आसपास के सैकड़ों ग्राम पंचायतों के लोग आते थे।

    जय लंकेश हर हर महादेव के जयकारे

    जय लंकेश हर हर महादेव के जयकारे

    यहां भगवान श्री राम के बाद रावण की भी पूजा की जाती है। पंडित रमेश ने जानकारी दी कि रनेही हाउस बस चौराहे से ढोल-नगाड़े बजाते हुए जय लंकेश एवं हर-हर महादेव के जय कारे लगाते हुए हुए 150-200 लोग पुलिस थाना मैदान पहुंचते हैं। यहां पर रावण की प्रतिमा स्थापित है। सबसे पहले रावण की मूर्ति को स्नान कराया जाता है। जनेऊ अर्पित की जाती है। शुद्ध देशी घी के जाले दीपक से रावण की आरती की जाती है। फिर प्रसाद चढ़ाकर श्रद्धालुओं को बांटा जाता है।

    54 वर्षों से कर रहा हूं पूजा

    54 वर्षों से कर रहा हूं पूजा

    पंडित रमेश मिश्रा ने जानकारी दी कि में विजयदशमी के दिन 45 साल से लगातार रावण की पूजा कर रहा हूं। मेरे दादा पंडित श्यामराम मिश्रा राजदरबार के पुजारी थे। वे भी प्रतिवर्ष रावण की पूजा करते थे। पूर्वजों का कहना था कि रावण गौतम ऋषि के नाती और विश्वश्रवा के बेटे थे। हमारा कुल गोत्र भी गौतम है। हम रावण के वंशज हैं। रावण महादेव के अनन्य भक्त, विद्वान, त्रिकालदर्शी थे। रावण ने ही श्री महादेव को खुश करने के लिए शिव तांडव स्त्रोत की रचना की थी। इस वजह से हमारी पीढ़ी दर पीढ़ी रावण की पूजा करती आ रही हैं।

    मूर्ति तोड़ने वक्त निकला था नाग

    मूर्ति तोड़ने वक्त निकला था नाग

    पंडित रमेश मिश्रा के दावे अनुसार, 16 साल पहले एक घटना हुई थी. देर रात उनको सपना आया था कि रावण की मूर्ति को तोड़ कर थाने का निर्माण किया जा रहा है। इसी सपने से उनकी नींद खुल गई। तब पंडित मिश्रा ने वहां जाकर देखा जहां रावण की मूर्ति थी। उन्होंने पाया कि बुलडोजर से वहां खुदाई का काम कराया जा रहा था और रावण की विशाल मूर्ति को हटाने की कोशिश की जा रही थी। जैसे ही बुलडोजर चालक ने रावण की मूर्ति के एक सिर पर बुलडोजर चलाया। तभी एक भयानक सांप आ गया और वहां पर हड़कंप मच गया. इस बात की जानकारी रमेश मिश्रा ने मौजूदा पुलिस अधीक्षक को दी। तब जाकर काम को को रोका गया और थाने की इमारत रावण विशाल मूर्ति के पीछे बनाई गई। लेकिन रावण की मूर्ति नहीं हटाई जा सकी और वह अब थाना मैदान में मौजूद है।

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