MP में किसानों की अनदेखी, मंडी बोर्ड पर कर्ज की साजिश और भावांतर योजना की नाकामी: अरुण यादव का बड़ा खुलासा
मध्य प्रदेश में किसानों की बढ़ती परेशानियों के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव ने आज भोपाल में एक प्रेस वार्ता आयोजित की। इस दौरान उन्होंने प्रदेश और केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार किया। यादव ने किसानों की अनदेखी, मंडी बोर्ड पर अतिरिक्त कर्ज चढ़ाने की कथित साजिश, भावांतर भुगतान योजना की विफलता और कृषि तंत्र के निजीकरण की दिशा में कदमों को किसान विरोधी करार दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों के हितों की बजाय ठेकेदारों, व्यापारियों और राजनीतिक चंदे के नेटवर्क को फायदा पहुंचाने पर तुली हुई है। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य सरकार ने हाल ही में सोयाबीन किसानों के लिए भावांतर योजना को पुनः शुरू किया है, जिसकी आलोचना विपक्ष लंबे समय से करता आ रहा है।

अरुण यादव की यह प्रेस वार्ता मध्य प्रदेश कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर लाइव प्रसारित भी की गई, जहां उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियां किसानों को लूटने और सरकारी संस्थाओं को कमजोर करने का माध्यम बन रही हैं। यादव ने एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर खरीदी की कमी, फसल बीमा योजना की सीमित पहुंच और बुरहानपुर के केला किसानों की बदहाली जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ही 'स्क्रिप्ट' पर काम कर रहे हैं, जो मंडी बोर्ड को कर्ज के जाल में फंसा कर निजीकरण की राह प्रशस्त कर रही है।
किसानों की अनदेखी: एमएसपी की मांग अधर में लटकी
अरुण यादव ने प्रेस वार्ता की शुरुआत दिल्ली में किसानों के 8 महीने लंबे आंदोलन का जिक्र करते हुए की। उन्होंने कहा कि देशभर में सरकारी संस्थाओं को बेचने का सिलसिला तेज है, लेकिन किसानों की एमएसपी की बुनियादी मांग पूरी नहीं हो रही। मध्य प्रदेश में सोयाबीन का एमएसपी 5328 रुपये प्रति क्विंटल तय है, लेकिन मंडियों में यह मात्र 3500 रुपये के आसपास बिक रहा है। मक्का का एमएसपी 2225 रुपये प्रति क्विंटल है, फिर भी उत्पादक किसानों को उचित दाम नहीं मिल रहे। कपास के किसानों की स्थिति भी ऐसी ही है, जहां सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदी में पूरी तरह विफलता दिखाई है।
यादव ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा कि मध्य प्रदेश से आने वाले मंत्री होने के बावजूद वे प्रदेश के किसानों की पीड़ा को नजरअंदाज कर रहे हैं। उन्होंने हाल की अतिवृष्टि का उदाहरण दिया, जहां फसल नुकसान के बावजूद किसानों को न राहत राशि मिली और न ही कोई अन्य सहायता। यह आरोप राज्य सरकार की हालिया भावांतर योजना की पुनः शुरुआत के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जिसे विपक्ष 'आंख मिचौली' करार दे रहा है।
भावांतर योजना: फ्लॉप शो की पुनरावृत्ति?
भावांतर भुगतान योजना (बीबीवाई) को मध्य प्रदेश में 2017 में पहली बार लागू किया गया था, लेकिन इसकी कमियों के कारण कांग्रेस सरकार ने इसे समाप्त कर दिया था। अब 2025 में सोयाबीन किसानों के लिए इसे पुनः शुरू किया गया है, जहां यदि मंडी मूल्य एमएसपी से कम हो तो अंतर की राशि सीधे किसान के खाते में हस्तांतरित की जाएगी। योजना 24 अक्टूबर 2025 से 15 जनवरी 2026 तक चलेगी, और लगभग 6 लाख किसानों को लाभ पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में इसकी समीक्षा की और डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
लेकिन अरुण यादव ने इसे 'पूरी तरह फ्लॉप' बताते हुए सवाल उठाया कि यदि सरकार को योजना के लिए पैसा देना है, तो मंडी बोर्ड को 1500 करोड़ रुपये का लोन क्यों दिलाया जा रहा है? उन्होंने कहा कि मंडी बोर्ड एक स्वायत्त संस्था है, और इस अतिरिक्त बोझ से इसे बंद करने की साजिश रची जा रही है। यादव ने 'भावांतर उत्सव' का जिक्र करते हुए व्यंग्य किया कि किसानों को भुगतान न मिलने पर राजधानी में उत्सव मनाना उनकी 'खाली जेबों' पर तमाशा है। यह योजना व्यापारियों के लाभ और किसानों की लूट के लिए बनी लगती है, उन्होंने आरोप लगाया।
मंडी बोर्ड पर कर्ज का जाल: साजिश या लापरवाही?
मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड पर पहले से ही 1700 करोड़ रुपये की लेनदारी राज्य सरकार पर है। कर्मचारियों को वेतन और पेंशन समय पर नहीं मिल रहे, और प्रदेश की 259 मंडियों में से करीब 150 में सचिवों की कमी है। एक सचिव को औसतन 100 किलोमीटर दूर की 4-5 मंडियों का प्रभार सौंपा गया है। ऐसे में 1500 करोड़ का अतिरिक्त लोन लेने का टेंडर जारी करना मंडी अधिनियम 1972 का उल्लंघन है, जहां बोर्ड द्वारा ऋण लेने का कोई प्रावधान नहीं।
यादव ने कृषि मंत्री इंदल सिंह कंसाना के विरोध का जिक्र किया, जिन्होंने इस कदम का विरोध किया था, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने सवाल किया कि क्या मुख्यमंत्री मंडी बोर्ड को कर्ज में डुबोकर बैंक से गिरवी रखने और निजीकरण की पटकथा लिख रहे हैं? मंडी बोर्ड के कर्मचारी इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास चुकाने का कोई साधन नहीं।
फसल बीमा और बुरहानपुर के केला किसान: बदहाली की हकीकत
फसल बीमा योजना का लाभ केवल 10-12 जिलों के चुनिंदा किसानों तक सीमित है। बुरहानपुर के केला उत्पादक किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं, जहां उचित दाम न मिलने और फसल खराब होने पर बीमा का कोई प्रावधान नहीं। हाल की अतिवृष्टि से फसल बर्बाद होने पर न राहत मिली और न बीमा। कपास किसानों की समस्याओं पर भी सरकार का कोई ध्यान नहीं। यादव ने कहा कि यह सब ठेकेदारों और व्यापारियों के हित में हो रहा है।
कृषि तंत्र का निजीकरण: किसानों के हितों पर चोट
अरुण यादव ने आरोप लगाया कि मंडी बोर्ड को कमजोर कर कृषि तंत्र को निजी हाथों में सौंपने की साजिश चल रही है। सरकार की नीतियां किसानों के बजाय व्यापारियों को मजबूत कर रही हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें एक ही दिशा में काम कर रही हैं, जो किसानों को मजबूरन बाजार की मार झेलने पर छोड़ रही हैं।
कांग्रेस की सशक्त मांगें: तत्काल कार्रवाई की अपील
प्रेस वार्ता के अंत में अरुण यादव ने सरकार से निम्नलिखित मांगें रखीं:
| मांग | विवरण |
| मंडी बोर्ड का संरक्षण | आर्थिक संकट से बचाएं और बंद करने की साजिश रोकी जाए। |
| भावांतर योजना बंद | सोयाबीन (5328 रुपये/क्विंटल), मक्का (2225 रुपये/क्विंटल) और कपास पर एमएसपी खरीदी सुनिश्चित करें। |
| केला किसानों के लिए राहत | बुरहानपुर में उचित दाम और फसल बीमा की व्यवस्था। |
| मंडी प्रबंधन सुधार | सभी मंडियों में सचिव नियुक्ति और सुचारू संचालन। |
| फसल बीमा विस्तार | सभी किसानों के लिए प्रभावी योजना। |
| किसान हितैषी नीतियां | ठेकेदारों-व्यापारियों के हितों को बढ़ावा देना बंद करें। |
यादव ने चेतावनी दी कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो कांग्रेस किसानों के साथ सड़क पर उतरेगी। यह बयान मध्य प्रदेश की राजनीति में किसान मुद्दे को फिर से गरमाने का संकेत दे रहा है, खासकर जब राज्य सरकार भावांतर योजना को अपनी उपलब्धि बता रही है। उज्जैन में हाल ही में हुई ट्रैक्टर रैली में किसानों ने योजना का स्वागत किया था, लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह केवल अस्थायी राहत है।
मध्य प्रदेश, जो देश का 'सोयाबीन कटोरा' कहलाता है, यहां 66 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की खेती होती है। लेकिन गिरते दामों और मौसमी मार से किसान परेशान हैं। अरुण यादव का यह खुलासा न केवल राजनीतिक बहस छेड़ सकता है, बल्कि किसान आंदोलन को नई गति भी दे सकता है। सरकार की ओर से अभी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन मामला विधानसभा सत्र में गरमाने की संभावना है।












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