सारस, इंसान और भगवान: एक और सारस की अद्भुत कहानी, काली माता के मंदिर में रोज लगाता है अर्जी
हाल फ़िलहाल में अमेठी के आरिफ कानपुर के चिड़ियाघर अपने दोस्त सारस से मिलने चुपके से पहुंचे थे। जिसके बाद इनकी दोस्ती की चर्चा एक बार फिर इंटरनेट पर सुर्खियां बटोरने लगी। लेकिन आज आप एक ऐसे सारस के बारे में जानेंगे जो किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे गाँव का दोस्त है। यही नहीं, ये सारस काली माता का भक्त भी लगता है। ग्रामीणों के अनुसार यह सारस काली माता के स्थान पर आता है और घंटी बजाकर सुबह और शाम अपनी अर्जी भी लगता है।
सारस काली माता की सुबह-शाम करता है पूजा
दरअसल, इन दिनों यूपी के बस्ती जिले में भी एक सारस को गांव की आबोहवा भा गई है। उसने गांव वालों से दोस्ती कर ली है। गाँव वालों का कहना है कि सारस दिन भर गांव में इंसानों के बीच रहता है, लोगों से प्यार जताता है, खाता पीता है और सूरज ढलने के बाद अपने ठिकाने पर लौट जाता है। इतना ही नही यह सारस काली माता के मंदिर जाकर सुबह शाम घंटी बजाकर अपनी अर्जी लगता है और माता काली की पूजा करता है। लोगो की माने तो यह प्रतिदिन आकर आम इन्सान की तरह हर दिन पूजा पाठ करके इंसानों के बीच मे रहता है।

'पक्षी नहीं बल्कि गांव का सदस्य है ये सारस'
सारस सुबह सवेरे गांव में आ जाता है। पहले वह काली माता के स्थान पर घंटी बजाता है और फिर लोगों के दरवाजे पर जाता है। लोग सारस को खाना खिलाते हैं। सारस का इंसान और माता काली के प्रति यह आचरण देख कर सभी लोग अचंभित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि वह पक्षी नहीं बल्कि गांव का सदस्य है। बिना डर के सारस पूरे गांव में दिनभर घूमता है। जब उस को भूख लगती है तो परिवार के सदस्य की तरह किसी भी घर पर पहुंच जाता है। लोग भी बड़े प्यार से सारस को दाना खिलाते हैं और पानी पिलाते हैं।

"इस सारस को हमसे कोई नही छीन सकता"
ग्रामीण बताते है कि यह सारस दिन भर गांव में घूमता है और जब गांव के लोग खेत में काम करने के लिए जाते हैं तो ये वहां भी पहुंच जाता है। ग्रामीणों ने कहा कि इस सारस को हमसे कोई नही छीन सकता है। वह किसी को भी किसी प्रकार का नुकसान नही पहुँचा रहा है। उनका कहना है कि अगर आरिफ की तरह इस सारस को भी कोई लेने आया तो हम ले जाने नही देंगे।

आखिर कैसे इस गाँव में पहुंचा ये सारस
वहीं इस सारस के पैदा होने की कहानी भी काफी दिलचस्प है। लोग बताते हैं कि रोहारी गांव से थोड़ी दूरी पर ईंट भट्ठा पर काम करने वाले मजदूरों को खेत में एक साल पहले दो बड़े अंडे मिले थे। उन लोगों ने उस अंडे को बत्तख का अंडा समझ लिया। लेकिन जब अंडे से बच्चा निकला तो वह सारस का बच्चा था। जिसके बाद मजदूरों ने उसे पालना शुरू कर दिया। जिनमे से एक बच्चे की तो मौत हो गई लेकिन दूसरा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। जब वह उड़ने लगा तो मजदूरों ने उसे आजाद छोड़ दिया।

कर दिया था आजाद, फिर आ गया वापस
ग्रामीणों का कहना है कि सारस की इंसानों से इतनी मोहब्बत हो गई थी कि आजाद छोड़ने के बाद भी वह दिन भर पास के गांव में आ जाता है। माता के स्थान पर लगी घंटी बजा कर अर्जी लगाता है। फिर गाँव वालों का दिया खाना खाता-पीता है और फिर अपने घर यानी भट्ठे पर चला जाता है।

उधर डीएम प्रियंका निरंजन का इस मामले पर कहना है कि सूचना मिलने पर इस सम्बंध में वन विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए गए है। वह वहाँ जाकर देखे और अवगत कराएं कि अगर किसी के द्वारा उसको कोई नुकसान पहुचाया जाएगा तो उसके खिलाफ वन्य अधिनियम के तहत कार्यवाही की जाएगी।












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