राहत में देरी पर उत्तराखंड सरकार को मानवाधिकार आयोग की नोटिस
देहरादून। उत्तराखंड में मची तबाही के बाद राहत में देरी और आंकड़ों पर अलग-अलग जबाव से राज्य सरकार सवालों के घेरे में आ गई है। बहुगुणा सरकार पर सवाल उठते रहे है। सरकार के इस रवैये पर अब राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी सवाल खड़े कर दिए है।
राज्य मानवाधिकार आयोग ने ना केवल सरकार के राहत के तरीकों पर सवाल उठा दिया है बल्कि मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने यहां तक कह दिया है कि सरकार राहत सामग्री के नाम पर ऐसी चीजें भेज रही हैं जिनकी प्रभावित इलाकों में जरूरत ही नहीं है।

उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस वीरेंद्र जैन ने बहुगुणा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि बहुगुणा सरकार जो आंकड़े पेश कर रही है वो खुद भी उसे लेकर पुख्ता नहीं है। सरकार कह रही है कि हमारे पास 300 गांवों का आंकड़ा है और फिर कह रही है कि ये आंकड़े पुख्ता नहीं है। सरकार के रवाये पर आयोग ने सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार के अलग-अलग अधिकारी अपनी-अपनी बयानबाजी कर रहे है। उनके विरोधाभासी बयानों से साफ होता है कि सरकार खुद अभी भ्रम की स्थिति में है।
आयोग ने राहत के नाम पर भेजी जा रही सामग्री पर भी बहुगुणा सरकार को ही लताड़ लगाई है। आयोग के मुताबिक देर से जागने के बाद भी सरकार पीड़ितों को ऐसे सामान भेजे जा रहे है जिनकी उन्हें जरुरत ही नहीं है। सरकार के काम से नाराज उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार को नोटिस भी भेजा है। आयोग की नोटिस का जबाव देने के बजाए राज्य सरकार एक-दूसरे पर ही आरोप मढ़ने में व्यस्त है।
सूबे के मुख्य सचिव राकेश शर्मा के मुताबिक मीडिया ने सेना के काम को ज्यादा तरजीह दी और राज्य प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया। सरकारी अधिकारियों का ये रवैया उन्हें सवालों के धेरे में लाता है। अब सवाल ये है कि ऐसी त्रासदी के बाद भी राज्य प्रशासन सेना को आगे कर खुद पीछे रहने की बात क्यों कर रहा है। जबकि ऐसे हालात में उसे भी युद्धस्तर पर सेना के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए था। जबकि राज्य मानवाधिकार आयोग के कड़े रुख से साफ है कि राज्य सरकार अभी भी लापरवाही बरत रही है।












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