संभावित हार के बीच 9 साल की यूपीए का जश्न

[नवीन निगम] यूपीए-2 के आज चार साल पूरे हो गए है, लेकिन कांग्रेस के अंदर जोश कम और अगले साल चुनाव का सामना करने का भय ज्यादा नजर आ रहा है। महज एक साल पहले इसी दिन यूपीए-2 के तीन साल पूरे होने पर कांग्रेस घोटालों और ममता के छोड़ जाने के बावजूद उत्साह से लबरेज थी क्योंकि दो नए घटक सपा और बसपा न केवल उसके साथ आ गए थे बल्कि मुलायम और बसपा उसके जश्न में शामिल हुए थे और फोटो भी खिंचवाई थी।

इस बार खबर आ रही है कि सपा और बसपा ने जश्न से दूर रहने का ही नहीं बल्कि आज उसे कोसना भी शुरू कर दिया है। सपा के महासचिव व राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रो. रामगोपाल यादव संप्रग सरकार के बीते चार साल को कुछ यूं देखते हैं, सरकार के पास भ्रष्टाचार व घोटालों के अलावा उपलब्धियों के रूप में बताने को है ही क्या। अब समझ लीजिए जो सहयोगी आपके पास खड़े होने से डर रहे हो वह लड़ाई के वक्त तो आपके खिलाफ ही लड़ेगे।

सपा और बसपा का व्यवहार यह बताने के लिए काफी है कि यूपीए-2 का यह जश्न शायद आखिरी जश्न साबित हो। यूपीए की तुलना आप 1989 की कांग्रेस से कर सकते है जब वीपी सिंह की बोफोर्स तोप के कारण कांग्रेसी चुनाव भी पूरे मन से नहीं लड़े थे मुझे याद है कि जब चुनाव के बाद उप्र में कांग्रेस ने हार की समीक्षा की थी तो पता चला कि चुनाव लडऩे के लिए कांग्रेस की तरफ से विधानसभा और लोकसभा के प्रत्याशियों को जो पैसा आंवटित हुआ था उसे कई प्रत्याशियों ने यह सोचकर खर्च नहीं किया कि हार तो रहे ही हैं कम से कम रकम ही बचा लो। यूपीए का हाल भी कुछ ऐसा ही है। आज उसके नेता संभावित हार को देखते हुए कि पैसा कमाने की होड़ में लग गए है। जो उसकी छवि को और नुकसान पहुंचा रहा है।

बीते वर्षो में समय-समय पर सपा और बसपा भले ही सरकार की संकटमोचक बनती रही हों, लेकिन वह उसके गुनाहों की भागीदार नहीं बनना चाहतीं। खास तौर से जब चुनावी साल सामने है और बड़े-बड़े घोटालों, भ्रष्टाचार व महंगाई को लेकर सरकार का दामन दागदार है। बुधवार को आयोजित होने वाले जलसे में सरकार चाहे अपनी जो उपलब्धियां गिनाए, लेकिन सपा-बसपा के गले उतरने वाली नहीं हैं। मनमोहन प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण यानी सरकार द्वारा दिए जाने वाले अनुदानों को सीधे जनता के खाते में हस्तांतरित करने और खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसी उपलब्धियों को गिनाएंगे। इसका मकसद एक साल से भी कम समय बाद होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस कार्यकर्ताओं का गिरा मनोबल ऊंचा करना होगा। लेकिन मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी यही मात खा रहे हैं।

जिस एफडीआई को वह अपनी उपलब्धि गिना रहे है। जनता के बीच उसकी छवि बहुत खराब हैं। खुदरा क्षेत्र में एफडीआई को भारत की जनता रोजगार छीनने वाली नीति मानती है और जो जनती इसे अच्छा समझती है वो वोट देने नहीं जाती। सिलसिलेवार घोटालों और हाल में कैबिनेट मंत्री पवन कुमार बंसल व अश्विनी कुमार को हटाए जाने से संप्रग सरकार की बिगड़ी छवि को प्रधानमंत्री द्वारा एक सकारात्मक रूप में पेश करने का काम आसान नहीं है।

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक पर कैसे आगे बढ़ा जाए, इस पर अपनी योजना का खुलासा भी करेंगे। अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी इन विधेयकों को बाजी पलटने वाले कदम के रूप में देख रही है, लेकिन कुल मिलाकर आज होने वाला यूपीए का जश्न फीका ही साबित होगा क्योंकि इस जश्न पर अगले साल चुनाव में संभावित हार की आशंका ज्यादा हावी रहेगी।

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