भारत के लिये कितने 'शरीफ' साबित होंगे शरीफ?
नयी दिल्ली (ब्यूरो)। भारत, आम चुनाव में नवाज शरीफ की जीत का स्वागत कर चुका है। उसने दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध बनाने के उनके ऐलान का भी गर्मजोशी से स्वागत किया है। लेकिन विदेशी मामलों के विशेषज्ञ अतीत में तालिबान के साथ रहे उनके सम्बंधों को देखते हुए थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के अध्यक्ष नवाज शरीफ का तीसरी बार पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना तय है। उन्होंने सोमवार को कहा कि वह शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आमंत्रित करेंगे।
उन्होंने भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने के अपने वादे को दोहराया। कराची में भारतीय महावाणिज्यदूत रह चुके राजीव डोगरा के अनुसार, शरीफ को अच्छी तरह पता है कि 1993 में मुंबई के सिलसिलेवार बम विस्फोट, 1999 के कारगिल युद्ध और मुंबई में 26/11 के हमले जैसी घटनाओं ने भारत को आहत किया है। डोगरा ने कहा कि उन्हें बखूबी पता है कि गलती क्या है और किसकी गलती है।

डोगर ने उनकी तालिबान के साथ 'सहानुभूति' पर सवाल खड़े किया। तालिबान ने चुनाव प्रचार के दौरान पीएमएल-एन के कार्यकर्ताओं को बख्श दिया। लेकिन उसने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी), अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) और मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के उम्मीदवारों पर जानलेवा हमले किए। यह भारत के लिए परेशानी की बात है। डोगरा ने कहा कि हमें खुद से सवाल पूछना चाहिए कि शरीफ की तालिबान के प्रति कितनी सहानुभूति है?
तालिबान से सहानुभूति मिलना खराब बात है और तालिबान के प्रति हमदर्दी रखना उससे भी खराब है। यह भारत के लिए परेशानी की बात होनी चाहिए, क्योंकि तब उनके मधुर संबंधों के वादों का कोई मतलब नहीं रह जाता। विश्व मामलों की भारतीय परिषद (आईसीडब्ल्यूए) के अध्यक्ष और पूर्व राजनयिक राजीव भाटिया ने कहा कि भारत के साथ रिश्तों के मामलों में शरीफ का बढ़िया इतिहास रहा है।
लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि आज के पाकिस्तान और 1999 के पाकिस्तान एवं दक्षिण एशिया के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। विदेश मंत्रालय में सचिव रहे एएन राम ने कहा कि शरीफ सज्जन व्यक्ति हैं। द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने में उनकी पिछली उपलब्धियां ठीक रही हैं। फिर भी कुछ दिनों के लिए हमें उन्हें परखना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार एस निहाल सिंह ने कहा कि यह देखना है कि शरीफ तालिबान के साथ अपने रिश्तों को किस तरह परिभाषित करते हैं। उन्हें सेना के साथ अपने संबंधों को पुन: परिभाषित करना है, जो कि पाकिस्तान में एक अहम स्तंभ है। उन्होंने कहा कि 1999 के कारगिल युद्ध में शरीफ की भूमिका को लेकर संशय है। फिर भी उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए कदम उठाया है।












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