कितने स्टेशन पार कर पायेगी सीपी जोशी की रेल?
[नवीन निगम] लगता रेलवे मंत्रालय की हालत भी अब नोएडा की तरह होने वाली है। उप्र में जब भी कोई मुख्यमंत्री नोएडा होकर आता है, तो माना जाता है कि उसकी कुर्सी चली जाती है। इसी अंघविश्वास के चलते पिछलो दिनों मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी नोएडा नहीं गए थे। अब रेल मंत्रालय की भी हालत कुछ ऐसी ही होती जा रही है। पिछले चार रेलमंत्री छह महीने से ज्यादा भी अपने पद पर नहीं रह सके। अब देखना यह है कि जोशी की रेल कितने स्टेशन पार कर पाती है।
सबसे बड़ी बात यह की रेलमंत्री के पद से हटने के बाद यह मंत्री भी नहीं रह पाए। जबकि पहले रेलमंत्री की स्थिति यह थी कि वह प्रधानमंत्री के बाद सबसे बड़ा पद माना जाता था इसीलिए इस मंत्रालय पर सहयोगी पार्टियों की हमेशा नजर रही और एनडीए की सरकार और उसके बाद यह लगातार सहयोगियों के पास ही रहा। ममता बनर्जी ने बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद रेल मंत्रालय क्या छोड़ा तब से इस विभाग पर शनि की साढे साती सवार हो गई।

तब से इस विभाग में मंत्री आ जा रहे है। ममता 26 मई 2001 को रेलमंत्री बनी और 19 मई 2011को उन्होंने यह मंत्रालय छोड़ा। उसके बाद ममता बनर्जी के कहने पर दिनेश त्रिवेदी को 12 जुलाई 2011 को रेलमंत्री बनाया गया। लेकिन बजट में यात्री किराया बढ़ाने पर उनकी अपनी ही नेता ममता बनर्जी से ऐसी ठनी कि उन्हें रेलमंत्री के पद से आनन-फानन में 14 मार्च 2014 को इस्तीफा देना पड़ा और रेलमंत्रालय से जाने के बाद वह राजनीति से भी लगभग बाहर हो गए। आज न वो तृणमूल में दिखाई पड़ रहे है न ही कहीं और। उनकी राजनीति लगभग समाप्त हो गई है।
दिनेश त्रिवेदी के बाद ममता बनर्जी के कहने पर उनके खास मुकुल रॉय को आनन-फानन में रेलमंत्री बनाया गया यह भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार हुआ कि रेल बजट पेश किसी ने किया और उसे समाप्त किसी और मंत्री ने किया। मुकुल रॉय 20 मार्च 2012 को रेलमंत्री बने और 21 सितम्बर 2012 को ममता बनर्जी ने केद्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया और मुकुल रॉय को रेलमंत्री का पद छोडऩा पड़ा। इसके बाद 22 सितम्बर 2012 को सीपी जोशी को जब रेलमंत्री बनाया गया तो लगा कि अब रेल विभाग में स्थिरता आ जाएंगी लेकिन सीपी जोशी के एक महीने के कार्यकाल में इतने एक्सीडेंट हुए कि कांग्रेस ने उन्हें हटाकर अपने सबसे योग्य मंत्री पवन बंसल को यह जिम्मेदारी सौंप दी। सीपी जोशी को 28 अक्टूबर 2012 को हटाकर उसी दिन पवन बंसल को यह जिम्मदारी दी गई।
कांग्रेस को लगा कि अब रेल मंत्रालय में स्थिरता आ जाएंगी लेकिन पवन बंसल का भांजा चंडीगढ़ में घूस लेते पकड़ा गया और पवन बंसल को भी 10 मई को रेलमंत्रालय से बाहर जाना पड़ा और रेलमंत्रालय से बाहर जाने के बाद उनका राजनैतिक रसूख भी अब खतरे में है। रेलमंत्रालय में पिछले चार मंत्री ऐसे हुए जो अपनी कुर्सी पर टिके नहीं रह सके और कुर्सी के हटने के बाद उनका राजनीति भी धाराशायी होती दिखी पड़ी।












Click it and Unblock the Notifications