कर्नाटक में चल रहा भ्रष्टाचार बनाम भ्रष्टाचार
बेंगलूरु (अजय मोहन)। 225 सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा की 223 सीटों के लिये मतदान शुरू हो चुका है। सुबह से ही मतदान केंद्रों में भारी भीड़ दिखाई दे रही है, लेकिन मुसीबत यह है कि वोटर कंफ्यूज है कि किसे वोट दें, क्योंकि यहां पर भ्रष्टाचार बनाम भ्रष्टाचार की जंग छिड़ी हुई है।
जी हां भ्रष्टाचार बनाम भ्रष्टाचार। ऐसा इसलिये क्योंकि यहां सभी बड़ी पार्टियों के पैर भ्रष्टाचार के दलदल में डूबे हुए हैं। सबसे पहले अगर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो राज्य में खनन घोटाले ने भाजपा की नैया में छेद कर दिया है। पानी धीरे-धीरे नाव में भर रहा है। आज फैसला हो जायेगा कि भाजपा की नाव डूबेगी या तैरती रहेगी। वहीं अगर कांग्रेस की बात करें तो केंद्र में इस पार्टी ने भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड कायम किया है, और यह बात देश भर में किसी से नहीं छिपी है। लिहाजा जब वोटिंग मशीन पर वोटर जब कमल का फूल और पंजे का निशान देखते हैं, तो इन्हें सिर्फ यही बात जहन में आती है, कि क्या करूं किसे वोट दूं।
तीसरा ऑप्शन पूर्व मुख्यमंत्री की पार्टी बीएस येदियुरप्पा की पार्टी कर्नाटक जनता पार्टी है। लेकिन इस पार्टी के मुखिया का रिकॉर्ड भी भ्रष्टाचार के मामले में काफी खराब है। ये भी भ्रष्टाचार के दलदल से ही बाहर निकल कर चुनाव लड़ने आये हैं।
तो क्या होगा चुनावी फैक्टर
सच पूछिए तो कर्नाटक में पैसे ने भ्रष्टाचार पर जीत लगभग हासिल कर ली है। यहां के वोटर उन करोड़पति नेताओं से खासे खुश हैं, जिन्होंने उनके इलाकों के लिये धन मुहैया कराया। यही नहीं कर्नाटक के इन धनपशुओं ने इस चुनाव में जमकर पैसा भी बहाया है, लिहाजा उसका प्रभाव आज के मतदान में देखा जा सकता है। और अंतिम फैक्टर है जातिवाद का।
कर्नाटक में तीन जातियों के बीच जंग चल रही है। पहली दलित, दूसरी लिंगइया और तीसरी आईटी। जी हां आईटी हब होने के कारण एक बहुत बड़ा वर्ग उन लोगों का है, जो पिछले कई साल से कर्नाटक में रह रहे हैं और आज यहीं के स्थाई नागरिक बन चुके हैं। ये सबसे युवा वर्ग भी है। लेकिन आईटी वर्ग में सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें ऐसे लोग शामिल हैं, जो अपने स्थानीय विधायक का नाम तक नहीं जानते, लिहाजा आस-पड़ोस के करीबी लोग जिसे वोट डालने के लिये कहेंगे, ये वोट उसी को देंगे।













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