लोकप्रिय छवि के मामले में मोदी से पीछे छूटे शिवराज सिंह

इन तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को देश के आदर्श मुख्यमंत्री तक गिनाने में कभी किसी ने गुरेज नहीं किया, मगर जब बात संसदीय बोर्ड में जगह दिए जाने की आई तो मोदी बाजी मार ले गए। चौहान की गिनती जरुर इस बोर्ड में स्थान पाने के दावेदारों में होती रही है, मगर पार्टी ने उन पर दाव लगाना उचित नहीं समझा। पार्टी की कमान राजनाथ सिंह को सौंपे जाने के बाद से ही सभी की नजर संसदीय बोर्ड पर थी।
राजनाथ सिंह जब भोपाल आए थे तब उनसे इस मसले पर संवाददाताओं ने सवाल भी किया था, मगर उनका जवाब यही था कि घोषणा होते ही सब कुछ सामने आ जाएगा। अब जो कुछ सामने आया है उसने कई राजनीतिक मायनों को भी जन्म दे दिया है। तस्वीर भी साफ हो गई है कि पार्टी के अन्य मुख्यमंत्रियों के मुकाबले मोदी की हैंसियत और अहमियत कहीं ज्यादा है।
अगर बात राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले और बाद की करें तो एक बात तो साफ हो जाती है किे पार्टी की कार्यसमिति से लेकर अन्य आयोजनों में चाहे राजनाथ हों, या लालकृष्ण आडवाणी या सुषमा स्वराज सभी मोदी के गुजरात के विकास का गुणगान करते नहीं थकते थे तो मध्य प्रदेश में बालिका जन्म से लेकर महिला सषक्तिकरण के लिए चलाई जा रही योजनाओं को देश के लिए आदर्श करार देने में पीछे नहीं रहे।
एक तरफ खुले तौर पर इन दिग्गज नेताओं द्वारा मोदी व चौहान की कार्यशैली की सराहना किया जाना, वहीं पार्टी के अंदर खाने चलने वाली रस्साकशी ने दोनों को एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी बना दिया था। यह बात अल्हदा है कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की तरह चौहान आमजन की चर्चा का हिस्सा कम ही रहे है। सूत्रों के मुताबिक चौहान को संसदीय बोर्ड में स्थान मिल सकता था, मगर उनके खिलाफ सक्रिय एक गुट विशेष ने उनका रास्ता रोक दिया। इसकी भी वजह है क्योंकि चौहान ने प्रभात झा और उमा भारती को महासचिव बनाए जाने की संभावनाओं के बीच अपना विरोध दर्ज कराया था।
एक तरफ चौहान ने विरोध दर्ज कराया तो उनके विरोधियों ने चौहान को संसदीय बोर्ड में स्थान न देने का दवाब बनाया। दवाब दोनों का काम आया झा व उमा भारती महासचिव की जगह उपाध्यक्ष बनाए गए तो चौहान को संसदीय बोर्ड में जगह नहीं मिल पाई। वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया का कहना है कि भाजपा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक धडे के द्वारा चौहान को मोदी के समानांतर खडा करने की कोशिश की गई मगर भाजपा व संघ के भीतर बदले संमीकरणों ने चौहान का रास्ता रोक दिया।
वहीं मोदी को दोनों का साथ मिला। लिहाजा मोदी संसदीय बोर्ड में जगह पा गए और चौहान इससे वंचित रहे। प्रदेश सरकार के नगरीय प्रशासन मंत्री बाबू लाल गौर तो चौहान व मोदी की तुलना का ही जायज नहीं मानते हैं, उनका कहना है कि मोदी ने गुजरात में विधानसभा के लगातार तीन चुनाव जीते हैं, वे भाजपा के एक ऐसे मुख्यमंत्री है जिनके नेतृत्व में भाजपा तीन चुनाव जीती है, जबकि चौहान के नेतृत्व में मध्य प्रदेश में भाजपा एक चुनाव जीता है। मोदी का संसदीय बोर्ड में लिया जाना जनभावना का सम्मान है। सूत्रों का कहना है कि चौहान के मुकाबले मोंदी की छवि कटटर हिंदूवादी नेता और विकास पुरुष की है, लिहाजा भाजपा को आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी की यह छवि ज्यादा फायदे मंद हो सकती है, इसीलिए मोदी को संसदीय बोर्ड में जगह दी गई है। (आईएएनएस)












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