15 साल में 6 परीक्षाओं में फेल हुईं सोनिया गांधी
नई दिल्ली। सोनिया गांधी ने गुरुवार को बतौर कांग्रेस अध्यक्ष पंद्रह वर्ष पूरे कर लिए। देश की और दुनिया की सबसे ताकतवर महिला के रूप में शुमार की जाने वाली सोनिया गांधी ने पार्टी प्रमुख के तौर पर न सिर्फ कांग्रेस को दो बार केंद्र की सत्ता में वापस लौटाया बल्कि भारतीय राजनीति में एक दमदार भूमिका भी निभाई। 66 वर्षीया सोनिया गांधी ने 1998 में 127 साल पुरानी इस पार्टी के अध्यक्ष पद को संभाला था और तब से वह लगातार इस पद पर बनी हुई हैं।
लगातार सबसे अधिक वक्त तक पार्टी अध्यक्ष रहने का रिकॉर्ड उनके नाम के साथ जुड़ गया है। सोनिया भले ही कितने भी रिकॉर्ड अपने नाम कर ले, लेकिन पार्टी में उनकी कुछ अबतक दूर नहीं हो पाई। सोनिया के सामने इस दौरान परीक्षाओं की घड़ी कई बार आयीं लेकिन उन्होंने उनका डंट कर सामना किया, लेकिन छह परीक्षाएं ऐसी रहीं, जिन्हें वो कभी पास नहीं कर पायीं।

परीक्षा 1: गांधी परिवार से बाहर सोचना
कांग्रेस पार्टी हमेशा ने नेतृत्व के लिए गांधी परिवार की मोहताज रही है। 1998 में भी कांग्रेस गांधी परिवार के नेतृत्व की मोहताज थी और 15 साल बाद भी पार्टी गांधी परिवार के ही नेतृत्व की मोहताज है। सोनिया की अध्यक्षता और राहुल गांधी के लगातार युवा नेताओं को आगे लाने की कोशिश आज तक रंग नहीं ला पाई है। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री के तौर पर 9 साल के कार्यकाल के बावजूद आज तक कांग्रेस में गांधी परिवार के बाहर कोई भी नेता राष्ट्रीय स्तर पर अपने नेतृत्व का लोहा नहीं मनवा पाया है। ये सोनिया की ही कमी है कि कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय पार्टी में नेतृत्व के काबिल कोई नहीं बन पाया है। हमेशा ये बागडोर गांधी परिवार के हाथों में ही रही है।
परीक्षा 2: जी हुजूरी से ऊपर उठना
1998 में सीताराम केसरी के बाद जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली तब भी पार्टी में आलाकमान गांधी परिवार ही सर्वोच्च था। अब हालत यह है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में पार्टी के नेता आलाकमान पर चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव जितवाने के लिए निर्भर हैं। कांग्रेस के ज्यादातर प्रदेशों में नेता चुनावी जीत के लिए आलाकमान की ओर देखते हैं। पार्टी में आलाकमान की मर्जी के बिना या उनके आदेश के बिना कोई भी छोटा से छोटा फैसला नहीं लिया जाता। यानी कांग्रेस में जी हुजूरी की परंपरा को वो खत्म नहीं कर पायीं।
परीक्षा 3: महंगाई से नहीं दिला पायीं निजात
जब 1998 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद सोनिया ने पार्टी की कमान संभाली और 2004 में कांग्रेस को देश की सत्ता में लेकर आई। जब कांग्रेस सत्ता में आई उस वक्त भारत में महंगाई दर 3.77 फीसदी थी। लेकिन फरवरी, 2013 में यही आंकड़ा 10.91 फीसदी पर पहुंच गया। मंहगाई का ये ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। ये साफ करते है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व और उनकी नीतियों ने भले ही कांग्रेस को बुंलदियों पर पहुंचाया हो लेकिन देश में फैल रही महंगाई के आग को वो रोकने में नाकामयाब रही है।
परीक्षा 4: भ्रष्टाचार को नहीं रोक पायीं
ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के 2004 के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स के आंकड़ों के मुताबिक भारत सबसे ईमानदार देशों की सूची में 90 वें स्थान पर था। लेकिन 2012 में भारत इसी सूची में 94 वें स्थान पर चला गया। इसका मतलब है कि देश में भ्रष्टाचार पिछले 8 सालों में बढ़ा है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस राज के दौरान पिछले 8-9 सालों में देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है। यही वजह है कि अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल कानून के लिए जोरदार आंदोलन के बावजूद सोनिया भ्रष्टाचार से मजबूती लड़ने वाला लोकपाल कानून पास नहीं करवा पाई हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान रोजाना कोई ना कोई घोटालों का खुलासा होता ही रहा है। फिर चाहे वो कॉमनवेल्थ घोटाला हो, कोलगेट घोटाला हो, 2जी घोटाला हो। घोटाला की लिस्ट काफी लंबी है। सोनिया के कुशल नेतृत्व भी कांग्रेसियों के भीरत से भ्रष्टाचार के इस भूत को नहीं निकाल पाया।
परीक्षा 5: कांग्रेस में अंतरकलह
कांग्रेस हमेशा ने अंतर्कलंह की राजनीति का शिकार रही है। सोनिया का अनुभवी नेतृत्व और राहुल गांधी का युवा जोश भी पार्टी को इस बीमारी से नहीं बचा पाया। उत्तराखंड में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी में पल रहा भीरतघात खुलकर लोगों के सामने आ गया।
परीक्षा 6: हिंदी बेल्ट पर नहीं जमा पा रहीं सिक्का
सोनिया ने नेतृत्व में कांग्रेस लगातार दो बार से केन्द्र की राजनीति पर काबिज हुआ लेकिन हिन्दी पर्टी वाले राज्यों में इसकी पकड़ अब कमजोर रही है। देश की राजनीति में सबसे अहम माने जाने यूपी में कांग्रेस की हालत पतली रही है। 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का एक भी सांसद यूपी से संसद तक नहीं पहुंच पाया था। वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को यूपी में 21 सीटें मिली थीं। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हालत फिर खराब हो गई। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी सपा, बसपा और बीजेपी से भी पीछे रही।












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