वंशवाद की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है कांग्रेस पार्टी

वैसे तो यह पूरा देश जानता है कि कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार के अलावा किसी और को बड़े पद पर बैठने का अधिकार तक नहीं है। ज्यादा से ज्यादा अगर कोई पद मिल सकता है, तो वो है महासचिव का और फिर पार्टी में एक नहीं कई महासचिव मिलेंगे, ताकि कोई खुद को बड़ा न समझे। जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज राहुल गांधी तक। पार्टी में सर्वोच्च पद की बात आती है तो गांधी परिवार के व्यक्ति को ही वरीयता दी जाती है।
अगर वंशवाद शब्द को अगर एक बार किनारे भी रख दिया जाये, तो क्या राहुल गांधी से ज्यादा काबिल इस समय कांग्रेस में नहीं है? एके एंटनी, पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल समेत कई मझे हुए नेता हैं, जो इस पद के लिये काबिल थे, लेकिन उनके अदंर सिर्फ एक कमी थी कि उनका सरनेम गांधी नहीं था। वहीं अगर युवाओं की बात करें तो कांग्रेस में सचिन पायलट, मिलिंद दोवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रिया दत्त जैसे लोग भी हैं, लेकिन कांग्रेस ने इन्हें उपाध्यक्ष बनाना तो दूर, कभी फोकस तक करने की नहीं सोची, क्योंकि अगर इन युवाओं की छवि प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत हो गई, तो राहुल के लिये मुश्किल हो जायेगी।
खैर यह सिर्फ कांग्रेस में नहीं कई अन्य पार्टियां भी हैं, जहां वंशवाद पूरी तरह गहरा चुका है। उनमें प्रमुख नाम हैं चौधरी चरण सिंह की राष्ट्रीय लोकदल, मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और बाल ठाकरे की शिवसेना प्रमुख नाम हैं।












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