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नया परिसीमन भी नहीं रोक पाया विजय रथ

अहमदाबाद। आखिर बच ही गया दिवंगत अशोक भट्ट का गढ़। पुत्र भूषण भट्ट ने परिसीमन के बाद बनी जमालपुर-खाडिया के रूप में अस्तित्व में आई सीट बदले हुए समीकरणों के बावजूद जीत ली और जमालपुर के साथ जुड़े खाडिया और खाडिया से जुड़े अशोक भट्ट की लाज बचा ली, क्योंकि खाडिया वह सीट है, जो अशोक भट्ट का पर्याय बन चुकी थी। अशोक भट्ट यहाँ से लगातार आठ भार विधायक चुने गए थे।

जमालपुर-खाडिया सीट पर भूषण भट्ट ने कांग्रेस के समीरखान सिपाई को 6 हजार 359 मतों से परास्त कर दिया, लेकिन भूषण की इस जीत में सबसे बड़ा योगदान रहा कांग्रेस से बगावत कर चुनाव मैदान में उतरे निवर्तमान विधायक साबिर काबलीवाला। साबिर के सहारे भूषण अपने पिता अशोक भट्ट का गढ़ बचाने में कामयाब रहे। 2007 में साबिर जमालपुर सीट से कांग्रेस विधायक के रूप में चुने गए थे, लेकिन कांग्रेस ने परिसीमन के बाद बदले समीकरण के चलते नई अस्तित्व में आई जमालपुर-खाडिया सीट से साबिर को टिकट नहीं दिया और साबिर ने बगावत कर दी।

Bhushan Bhatt wins in Jamalpur again

घोषित चुनाव परिणाम के अनुसार भूषण भट्ट ने कांग्रेस के समीरखान सिपाई को परास्त किया। भूषण को 48 हजार 388 मत हासिल हुए, जबकि समीरखान 42 हजार 29 मत हासिल करने में सफल रहे, लेकिन इससे भी बढ़ कर कोई फैक्टर है, तो वो है साबिर काबलीवाला, जिन्हें 30 हजार 668 मत हथिया लिए। जाहिर सी बात है कि यदि साबिर ने बगावत न की होती, तो साबिर और समीरखान के मतों का योग भूषण को कहीं ठहरने नहीं देता। इस प्रकार यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि साबिर के सहारे ही भूषण अपने पिता अशोक भट्ट का गढ़ बचाने में सफल रहे।

क्या कहता है इतिहास

खाडिया विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई थी। 2007 तक यहाँ हुए बारह चुनावों में जहां अशोक भट्ट 8 बार विधायक रहे, वहीं कांग्रेस को सिर्फ एक बार जीतने का मौका मिला। सितम्बर-2011 में भट्ट के निधन हुआ और खाडिया को पहली बार उप चुनाव का सामना करना पड़ा। उस उप चुनाव में भाजपा की ओर से भट्ट के पुत्र भूषण विजयी रहे। स्वतंत्रता के बाद १९६० तक गुजरात सौराष्ट्र और मुंबई राज्यों का हिस्सा रहा।

इस दौरान 1951 में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए, तब खाडिया सीट नहीं थी। 1957 में बृहद मुंबई राज्य विधानसभा के लिए जब चुनाव हुए, तब खाडिया सीट अस्तित्व में आ चुकी थी। पहली बार यहां महागुजरात आंदोलन के नेता ब्रह्मकुमार भट्ट निर्दलीय विधायक के रूप में चुने गए। 1962 के विधानसभा चुनाव में पृथक गुजरात बन चुका था और भट्ट पुन: प्रजा समाजवादी पार्टी (पीएसपी) विधायक के रूप में चुने गए। 1967 के चुनाव में भी पीएसपी उम्मीदवार एम. जी. शास्त्री विजयी रहे।

कांग्रेस को पहली और आखिरी सफलता

कांग्रेस को यहां मात्र एक बार सफलता मिली। 1972 के चुनाव में उसके उम्मीदवार अजित पटेल विधायक चुने गए। 1975 से तो फिर खाडिया ने अशोक भट्ट के अलावा किसी को देखा ही नहीं। 1975 के चुनाव में अशोक भट्ट जनसंघ विधायक चुने गए, तो 1980, 1985, 1990, 1985, 1998, 2002 और 2007 के आम चुनावों में भी अशोक भट्ट भाजपा विधायक के रूप में लगातार जीतते आए।

परिसीमन से जुड़ा जमालपुर

परिसीमन के बाद खाडिया के साथ जमालपुर जुड़ गया। खाडिया विधानसभा क्षेत्र में पहले ही अल्पसंख्यकों की बहुलता अधिक थी, लेकिन जब जमालपुर के कई इलाके इसमें जुड़ गए, तो भाजपा की जीत पर सवाल खड़े होने लगे। ऐसे में खाडिया और भट्ट की पर्यायता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भूषण भट्ट के लिए बड़ी चुनौती थी और इस चुनौती से निपटने में भूषण को साथ मिला साबिर का।

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