Exclusive: किसके ताबूत में लगेगी आखिरी कील?
अहमदाबाद। बस अब अड़तालीस घण्टे का समय बाकी रह गया है। गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में दूसरे चरण के मतदान के बीच शनिवार और रविवार दो दिन बाकी हैं। आधा गुजरात अपना जनादेश दे चुका है। पहले चरण में 70 प्रतिशत से अधिक भारी मतदान कर मतदाताओं ने एक बात तो स्पष्ट कह दी है कि उनका झुकाव किसी एक पक्ष में है और दूसरे पक्ष का तहस-नहस होना तय है। यानी प्रथम चरण में सौराष्ट्र-दक्षिण गुजरात के मतदाताओं ने किसी एक पार्टी का ताबूत लगभग तैयार कर दिया है और दूसरे चरण में यानी 17 दिसम्बर को उत्तर-मध्य गुजरात के मतदाताओं द्वारा अब मात्र इस ताबूत में आखिरी कील लगाना बाकी है।
गुजरात में आम तौर पर विधानसभा चुनावों में 55 से 60 प्रतिशत के आसपास मतदान होता रहा है, परंतु इस बार के चुनाव में मतदाताओं ने भारी उत्साह दिखाते हुए तमाम रिकॉर्ड तोड़ डाले और 70 प्रतिशत से अधिक मतदान किया। दक्षिण गुजरात तथा सौराष्ट्र के मतदाताओं ने यह तो मात्र ट्रेलर दिखाया है। अभी उत्तर-मध्य गुजरात अपना परचम दिखाने को आतुर हैं।

पहले चरण में इतना भारी मतदान होने से एक बात तो तय हो गई है कि मतदाताओं ने किसी एक पक्ष में लहर का संकेत दिया है। राजनीतिक पंडित अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं, परंतु यदि गहराई से सोचा जाए, तो भारी मतदान का फायदा लेने के प्रथम अधिकारी कोई हैं, तो वे हैं मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी। उनके साथ सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि वे लगातार 11 वर्षों से शासन कर रहे हैं और इ दौरान उनके खिलाफ कोई सामूहिक विरोध नहीं देखा गया। ऐसे हालात में यह मान लेना आश्चर्यजनक कहलाएगा कि भारी मतदान सत्ता विरोधी लहर या एन्टी इन्कम्बेंसी है।
ऐसा नहीं है कि मोदी के खिलाफ गुजरात में आवाजें नहीं उठीं, परंतु अधिकांश आवाजें व्यक्तिगत लड़ाई तक सीमित रह गई हैं। फिर वह श्वेता भट्ट, जागृति पंड्या हो या फिर कनु कलसरिया। कांग्रेस भी उसी श्रेणी में आ जाती है, क्योंकि गुजरात कांग्रेस के नेता किसी भी बयान की शुरुआत ही मोदी के नाम के साथ करते रहे हैं। इसका सीधा संदेश यही है कि कांग्रेस का विरोध भाजपा के खिलाफ कम, मोदी के खिलाफ ज्यादा है। इस तरह मोदी के खिलाफ गुजरात में आम जनता से उठी हो ऐसी कोई सामूहिक आवाज नहीं है। अतः यह मानने का कोई कारण नहीं बनता कि अधिक मतदान सत्ता विरोधी लहर ही हो।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि यदि भारी मतदान कांग्रेस के पक्ष में हुआ मानें, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि कांग्रेस ने पिछले ग्यारह वर्षों में ऐसे तो कौन-से जनोन्मुखी कार्य कर डाले कि कांग्रेस के प्रति लोगों का प्यार उमड़ जाए? चलो मान लें कि गुजरात में वह सत्ता से बाहर है, परंतु सत्ता से बाहर रह कर भी कांग्रेस ने मोदी सरकार के खिलाफ कोई बड़े आंदोलन या जनसमर्थन तैयार नहीं किया है। हाँ, केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार है, परंतु उसके भी जो घोटाले सामने आए हैं, उन्हें देख कर जनता उसकी ओर आकर्षिक हो, यह बेमानी होगा।
तीसरी शक्ति के रूप में केशुभाई पटेल और उनकी जीपीपी मैदान में है, परंतु यहाँ भी यही सवाल पैदा होता है कि जनता केशुभाई या जीपीपी के पक्ष में इतना भारी मतदान क्यों करे? केशुभाई लगातार भाजपा में रहे हैं और चुनाव से पहले तक वे भाजपा में ही थे। एक व्यक्ति पिछले 11 वर्षों से शासन कररहा हो और केशुभाई मात्र 111 दिन में ऐसा कर सकते हैं कि पूरा का पूरा पटेल समाज या बाकी के तमाम वर्ग के लोग भी उनके पक्ष में इतना भारी मतदान कर दें।
अब बात करते हैं 17 दिसम्बर के मतदान की। सोमवार को दूसरे चरण के लिए मतदान होना है। पहले चरण में मतदान कर लोगों ने किसी एक पक्ष में अपना झुकाव तो दर्शा ही दिया है और दूसरे पक्ष के लिए ताबूत तैयार कर दिया है। 13 दिसम्बर को जिस तरह भारी मतदान हुआ है, उसका प्रभाव निश्चित रूप से दूसरे चरण पर भी पड़ेगा ही और लोग बड़ी संख्या में मतदान करने निकलें, तो आश्चर्य नहीं होगा। अतः पहले चरण में जो ताबूत तैयार हुआ है, उस पर आखिरी कील दूसरे चरण में लगनी तय है।
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