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गैबर्ड ने महकाई तुलसी, जेठमलानी से लज्जित राम

By कन्हैया कोष्टी
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अहमदाबाद, 9 नवम्बर। तुलसी गैबर्ड और राम जेठमलानी। कहने को दो नाम हैं। दोनों में समानता क्या है? पहली समानता तो यह है कि दोनों ही राजनीति में हैं। एक अमरीका की राजनीति में हैं, तो दूसरे भारत की राजनीति में।

भारत और अमरीका की राजनीति बिल्कुल भिन्न है। इसमें कोई दो-राय नहीं है, लेकिन हम यहाँ दोनों देशों की राजनीति की चर्चा नहीं कर रहे। इस वक्त चर्चा का मुख्य विषय नाम है और नाम के साथ जुड़ी भारतीय संस्कृति तथा भारतीय धर्म एवं अध्यात्म के प्रति आस्था है। दोनों ही राजनीतिक महानुभावों ने पिछले अड़तालीस घण्टों के दौरान एक क्रिया की है, परंतु दोनों की क्रियाओं में उनके नाम की सार्थकता को लेकर जबर्दस्त विरोधाभास दिखाई देता है।

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तुलसी गैबर्ड ने भारत से सात समंदर पार अमरीका में वहाँ की प्रतिनिधि सभा में शपथ ली है, तो दूसरी तरफ राम जेठमलानी ने अमरीका से सात समंदर दूर भारत में एक बयान दिया है। तुलसी गैबर्ड दरअसल भारतीय संस्कृति और उसके अध्यात्म, गीता-रामायण आदि शास्त्रों से ओतप्रोत हैं। तुलसी गैबर्ड हिन्दू माता और ईसाई पिता की संतान हैं। ऐसे में उनके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि तुलसी गैबर्ड में तुलसी भारत और भारतीय संस्कृति की प्रतीक है और इसका प्रमाण उन्होंने दिया भी। तुलसी गैबर्ड ने अमेरिका समेत पूरी दुनिया में इतिहास लिख दिया है क्योंकि वो पहली हिंदू-अमेरिकी महिला है जिन्होंने अमरीकी प्रतिनिधी सभा में हवेली सीट पर कब्जा जमाने के बाद प्रवेश किया है। वो पहली नेता हैं जिन्होंने भगवत गीता पढ़कर सदस्य पद की शपथ ली। इतना ही नहीं तुलसी गैबर्ड ने अपनी शपथ को बकायदा संस्कृत में पढ़ा। तुलसी गैबर्ड ने मीलों दूर अमरीका में रह कर गीता पढ़ कर शपथ ली। ऐसा करके वास्तव में उन्होंने अपने नाम में शामिल भारतीय संस्कृति के प्रतीक तुलसी को सार्थक कर दिखाया।

अब आइए आपको दिखाते हैं नाम के विरोधाभास का दूसरा चेहरा। भारत में तो आम तौर पर लोगों के नाम रामायण और महाभारत-गीता के पात्रों पर आधारित होते हैं। ऐसे ही एक महानुभाव हैं राम जेठमलानी। भारत की राजनीति में हैं। भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं।

एक तरफ अमरीका में तुलसी गैबर्ड पर जहाँ तुलसी रूपी भारतीय संस्कृति हावी थी, तो दूसरी तरफ यहाँ भारत में रहने वाले राम जेठमलानी अपने नाम में शामिल राम को ही लज्जित कर बैठे। रामायण के धोबी को ढाल बना कर राम जेठमलानी स्वयं ही राम के धोबी बन गए। उन्होंने कह दिया कि राम एक अच्छे पति नहीं थे, क्योंकि उन्होंने एक धोबी के कहने पर अपनी पत्नी सीता के साथ अन्याय किया। अब जरा बताइए कि जेठमलानीजी के मानसिक दिवालियापन को क्या नाम दिया जाए? सीता के साथ अन्याय के मुद्दे पर कई आलोचनाएँ और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। जेठमलानी बाकी रह गए थे क्या यह काम करने के लिए? उन्हें कम से कम अपने नाम में शामिल राम पर तो तरस आना चाहिए था। जेठमलानी इस तरह का बयान देते वक्त यह भूल गए कि राम ने धोबी की बात मान कर प्रजा को परिवार से ऊपर साबित किया। अब भला जेठमलानी को कौन समझाए? आज की राजनीति में प्रजा तो जाती है भाड़ में, परिवार ही सबसे ऊपर रहता है। ऐसे में जेठमलानी की सोच वर्तमान भारतीय राजनीति के हिसाब से बिल्कुल ठीक है। यही तो कारण है कि यदि नेहरू से लेकर इंदिरा और इंदिरा से लेकर राजीव-सोनिया-राहुल-प्रियंका तक परिवारवाद चला आ रहा है, तो जेठमलानी के बेटे महेश भी तो पिता की राजनीतिक विरासत संभालने को तैयार बैठे हैं। ऐसी परिवारवाद वाली मानसिकता में राम कहाँ ठहर सकते हैं?

प्रणाम है तुलसी गैबर्ड को, जिन्होंने अमरीका में रह कर गीता की शपथ ली और धिक्कार है राम जेठमलानी को, जो भारत में रह कर भी राम को नहीं समझ सकते।

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English summary
America's first ever Hindu Congress Woman Gabbard will take her oath of office over a Bhagavad Gita.
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