कौन है तालिबानियों की दुश्मन मलाला यूसफज़ई?
इंटरनेट और दुनिया भर के अखबारों में मलाला यूसफज़ई का नाम सुर्खियों में है। लोग इस नाम के बारे में खोज-खोज कर पढ़ रहे हैं कि आखिर ये कौन है, जिसके बारे में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार तक चिंतित हो गईं। मलाला नाम है उस बच्ची का जिसने 11 साल की उम्र में तालिबानियों के खिलाफ एक जंग की शुरुआत की थी। उसने जंग की शुरुआत कलम से की, आतंकियों ने जिसका जवाब बंदूक से दिया।
गत मंगलवार को पाकिस्तान की स्वात घाटी में रहने वाली मलाला स्कूल से घर लौट रही थी, तभी तहरीक-ए-तालिबान के आतंकियों ने उस पर हमला बोल दिया। आतंकी ने उसके माथे पर गोली मारी और वहां से चल दिये। मौके पर मौजूद लोग मुंह से एक शब्द भी नहीं बोल पाये और मलाला जमीन पर गिर पड़ी। आज वो कोमा में है। डॉक्टरों का कहना है कि मलाला के बचने की उम्मीद काफी कम है।
ताबिलबान ने क्यों किया मलाला पर हमला?
आखिर ऐसा क्या हुआ कि तालिबानी आतंकवादियों ने एक बच्ची को अपनी हिट लिस्ट में शामिल कर लिया। यही बात अब हम आपको बताने जा रहे हैं। मलाला को बच्चों के अधिकारों की कार्यकत्री के रूप में जाना जाता है। 1998 में पाकिस्तान के खैबर पख़्तूनख़्वाह प्रान्त में जनमी मलाला स्वात घाटी में रहती थी।
13 साल की उम्र में ही मलाला ने तालिबानी आतंकियों के अत्याचारों के बारे में एक नकली नाम से ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया। उसके इस ब्लॉग को प्रकाश में लाया बीबीसी न्यूज। उसी के बाद से उसे लोग जानने लगे। किड्स राइट्स फाउंडेशन ने मलाला को अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिये नामित भी किया, लेकिन उसे यह पुरस्कार नहीं मिल सका।
मलाला ने अपने ब्लॉग नकली नाम "गुल मकई" से लिखे। तालिबान की दरिंदगी का वर्णन करने के साथ-साथ मलाला ने अपने दर्द को डायरी में बयां किया। उसने लिखा, "आज स्कूल का आखिरी दिन था इसलिए हमने मैदान पर कुछ ज्यादा देर खेलने का फ़ैसला किया। मेरा मानना है कि एक दिन स्कूल खुलेगा लेकिन जाते समय मैंने स्कूल की इमारत को इस तरह देखा जैसे मैं यहां फिर कभी नहीं आऊंगी।"

मीडिया से खफा तालिबान
मलाला को कवरेज देने वाले मीडिया संस्थानों के प्रति तालिबान ने नाराज़गी जताई है। तालिबान ने धमकी दी है कि वो पाकिस्तान में स्थित कुछ मीडिया संस्थानों के कार्यालयों को निशाना बनायेगा। इसे देखते हुए मीडिया दफ्तरों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

मलाला के लिये लखनऊ में निकला जुलूस
लखनऊ के चौक इलाके में शनिवार को एक जुलूस निकाला गया, जिसमें छोटी-छोटी बच्चियों और महिलाओं ने मलाला की सलामती की दुआएं मांगीं और आतंकवाद को जड़ से खत्म करने की अपील की। तालिबान के खिलाफ नारेबाजी भी की गई। बच्चों ने नारे लगाते हुए कट्टरवाद, लड़कियों पर जुल्म और मौत के खेल को खत्म करने की मांग की।

मलाला की हालत में सुधार
पाकिस्तान सेना के मीडिया प्रकोष्ठ अंतर-सेवा जन सम्पर्क (आईएसपीआर) के महानिदेशक मेजर जनरल असीम बाजवा ने रविवार को बताया कि मलाला की हालत में अब सुधार हो रहा है। बाजवा ने कहा, "मलाला के हाथों और पैरों में हलचल देखी गई है। यह सकरात्मक संकेत है।"

दुआ कर रहे लोग
मलाला की सलामति के लिये दुनिया भर में दुआएं मांगी जा रही हैं। पाकिस्तान में हर मस्जिद में प्रार्थना सभाएं आयोजित की जा रही हैं।

घटना के बाद फतवा
मलाला पर हमले के बाद पाकिस्तान में सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल से जुड़े 50 से अधिक मौलवी और एक पूर्व मंत्री तालिबान के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने फतवा जारी कर महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली किशोरी मलाला यूसुफ जई की हत्या के प्रयास को गैर इस्लामी करार दिया।

स्वात के लिये शर्मिंदगी
मलाला का दोष महज इतना है कि वह स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी करने पर अड़ी थी, जबकि इस क्षेत्र में तालिबान का फरमान है कि लड़कियां स्कूल न जाएं। उस पर हमला सही मायने में स्वात के लिये शर्मिंदगी है।

बची तो फिर मारेंगे मलाला को
तालिबान ने कहा है कि रावलपिंडी के आर्मी हॉस्पिटल में भर्ती मलाला यूसुफजई अगर बच गई तो उसे फिर मारेंगे। उसे तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक उसकी मौत नहीं हो जाती।

दो महीने पहले बनी थी योजना
तालिबानी आतंकवादियों ने दो महीने पहले मलाला पर हमले की साजिश रची थी। हमले से पहले मलाला की रोज़ाना की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया और फिर मंगलवार को हमला कर दिया।

क्या करेगा पाकिस्तान?
मलाला के प्रति इतनी ज्यादा सुहानुभूति दिखाने वाली पाकिस्तान सरकार वाकई में तालिबानी आतंकियों के खिलाफ है या नहीं। यह सवाल बार-बार उठता है। अगर हां तो वो तालिबान से जुड़े अन्य आतंकी संगठनों का सपोर्ट क्यों करती है।












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