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राजीव के सपनों की पैरवी करने से चूके राहुल गांधी

Rahul Gandhi
कांग्रेस महासचिव और सांसद राहुल गांधी दो दिन की यात्रा पर जम्मू-कश्मीर में थे। कश्मीर में उनके कईं कार्यक्रम हुए। पाकपरस्त अलगाववादियों की भारतविरोधी चूं-चपड़ और गुमराह नौजवानों के एक तबके के मुखर विरोध के बीच कांग्रेस के युवराज ने कश्मीरियों के साथ राफ्ता कायम करने की स्वागतयोग्य पहल की। कश्मीर में अपने परिवार की जड़ों के संदर्भ में उनका खुद को 'कश्मीरी' कहना और कश्मीर के दर्द को समझने की इच्छा जताने का उनका जुमला किसको कितना भाया, खबर नहीं।

मगर अलगाववादियों के शोर-शराबे के समांतर वहां की नई पीढ़ी को शेष-भारत की विकास यात्रा के साथ कदम से कदम मिलाकर बढ़ने का उनका आवाहन निस्संदेह सराहनीय है। इसी दौरान उनके संग-संग चल रहे मुख्यमंत्री उमर को एक बार फिर सार्वजनिक रूप से यह दोहराते हुए सुनना भला किस भारतीय को अच्छा नहीं लगा होगा कि हम यानि कश्मीर के लोग भारतीय हैं और अनंतकाल तक भारतीय रहेंगे।

राहुल गांधी अपनी कश्मीर यात्रा पर अपने संग देश के शिखर उद्यमियों को भी लेकर गए थे। इनमें टाटा समूह के मुखिया रतन टाटा भी शामिल थे। टाटा ने यह कहते हुए राहुल की पहल का सराहा कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मौजूद विकास व निवेश की अनंत संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए हैं।

यह दीगर बात है कि इन दरवाजों के खुलने न खुलने के बारे में पक्के तौर पर कहना अभी जल्दबाजी होगी। ऐसा इसलिए चूंकि निवेश के लिए जैसा जमीनी माहौल चाहिए वह महज मंचीय भाषणों व नारों से तैयार नहीं होता। हां, ऐसा देर-सवेर हुआ तो प्रदेश व देश दोनों के लिए लाभकारी होगा।

मगर रतन टाटा जब राहुल गांधी की यात्रा में 'नए दरवाजे' खुलने की सकारात्मक कल्पना कर रहे थे, उसी समय श्रीनगर में कुछ लोगों को राहुल के दरवाजे से खाली हाथ भी लौटना पड़ा। यहां जिक्र कश्मीर के ग्रामीण अंचल के उन चुने हुए नुमाइंदों का है जो राज्य में ग्राम-स्वराज की धुरी हैं।

वे जिनको चुने जाने की प्रक्रिया में भारतीय लोकतंत्र की खनक और गरमाइश तीसियों बरस बाद इस सूबे के गांव-गांव तक पंहुची थी। यही वे लोग हैं जिनके हाथों दिल्ली व भारतीय संविधान के साथ घाटी के रिश्तों की डोर और अधिक मजबूत होने की उम्मीद पनपी थी।

जगजाहिर है कि ये लोग इन दिनों आतंकियों की खून जमा देने वाली धमकियों के साये में जी रहे हैं। धमकियां जो कतई खोखली बंदरभभकियां भी नहीं हैं। साल भर में दर्जनभर पंच-सरपंचों को मौत के घाट उतारा जा चुका है।

मारे भय के राज्य के करीब तैंतीस हजार में से एक हजार से अधिक पंच-सरपंच तो अपने पदों को त्याग भी चुके हैं। पिछले दिनों जब इनका एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में राहुल गांधी से मिला था तो उन्हें यह भरोसा दिया गया था कि राहुल श्रीनगर आकर उनकी बात सुनेंगे और उनके दुख-दर्द का हल निकालने में मदद करेंगें।

ये जनप्रतिनिधि अपने लिए चांद-सितारों की मांग भी नहीं कर रहे थे। इन्हें सुरक्षा चाहिए और पंचायती राज संस्थाओं का कानूनी सशक्तिकरण जिसके दम पर वे खुद भी सीना तान कर जेहादी संगीनों का सामना कर सकें। ऐसे में दिल्ली में हुई भेंट के बाद इनके मनों में आशा का समंदर ठाठें मारने लगा था।

मगर सुखद भविष्य के सुनहरे सपने परोसने श्रीनगर पंहुचे 'कश्मीरी' राहुल दिल्ली वाले राहुल नहीं रहे। पंच-सरपंचों के सम्मेलन के मंच से उनसे प्रभावी दखल की उम्मीद की जा रही थी। पर वे कश्मीरियों के साथ रिश्ता जोड़ने के अपने ही नारे को अमल में लाने के बजाय अब्दुल्ला परिवार की 'शेखशाही' के साथ पारिवारिक रिश्तेदारी निभाते प्रतीत हुए। सरपंचों को सुरक्षा देने के मामले में उन्हें कुछ कड़ा कहते नहीं सुना गया।

पंचायतों को मजबूत करने के लिए संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन राज्य में लागू करने की पंच-सरपंचों की मांग को भी नकार ही दिया। कहने लगे कि कानून में संशोधन करवाने वाले वे भला कौन होते हैं। बकौल राहुल यह काम तो राज्य के लोगों का है। यह कहते हुए कांग्रेस महासचिव भूल गए कि बयासी फीसदी मतदान करके राज्य के लोग तो इस मामले पर अपनी राय बहुत पहले दे चुके।

सच तो यह है कि ऐसा कह कर उन्होंने अपने दोस्त उमर को बड़ी राहत दे दी। उमर इन संशोधनों को लागू करने की खुल्लखुल्ला मुखालिफत कर रहे हैं। उमर कहते हैं कि यह संशोधन राज्य के लोगों के खिलाफ हैं। राहुल को ‘दोस्त‘ उमर से सिर्फ इतना पूछना चाहिए था कि उनके स्वर्गीय पिता व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सपनों का पंचायती राज कानून जब पूरे देश के लोगों के लिए लाभकारी हो सकता है तो उसे जम्मू कश्मीर के लिए नुकसानदेह किस आधार पर कहा जा रहा है?

इस सिलसिले में यह भी उल्लेखनीय है कि उमर के साथ राज्य की सरकार में साझीदार कांग्रेस पार्टी की राज्य इकाई भी राजीव के सपनों का ग्राम-स्वराज जम्मू कश्मीर के लोगों को देने की पक्षधर है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सैफुद्दीन सोज मुख्यमंत्री को खत लिख कर इस आशय की मांग कर चुके हैं। परंतु पार्टी के शिखर नेता राहुल गांधी का साथ उन्हें नहीं मिला।

श्रीनगर में राहुल से मिलने आए पंच-सरपंच भी उनके रवैये से निराश होकर उस कक्ष के दरवाजे से बाहर हो गए जिसमें कश्मीर के लिए कई 'दरवाजों' की कुंजियां थामे बैठे कांग्रेस महासचिव उनसे रूबरू हो रहे थे। खबर है कि खिन्न होकर यह सम्मेलन अधर में छोड़ने वाले ग्राम प्रधानों में से अधिकांश का ताल्लुक कांग्रेस के साथ ही था। इस मामले में एक रोचक तथ्य यह है कि राज्य का प्रमुख विपक्षी दल पीडीपी ही नहीं भाजपा व पैंथर्स पार्टी भी संविधान के 73 वें व 74 वें संशोधन के पक्षधर हैं।

पीडीपी तो विधानसभा में प्रस्ताव पेश करने की तैयारी में है। अभिप्राय यह कि सत्ता में साझीदार कांग्रेस को इस मुद्दे पर लगभग पूरे प्रतिपक्ष का सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त है। मगर पार्टी महासचिव इस अनुकूल स्थिति का लाभ लेने के बजाय मुस्कुराते हुए दिल्ली निकल गए। कहा जा सकता है कि घाटी में संबंधों के पुल बनाने और संवाद के नए दरवाजे खोलने की संभावनाएं तलाशने गए राहुल गांधी ने खुले-खुलाए हजारों दरवाजों पर दमदार दस्तक देने का बड़ा अवसर गवां दिया।

उन्होंने ऐसा क्यूं किया, कहना कठिन है। हां, उनसे खफा होकर निकले पंच-सरपंचों को घाटी के मीडिया ने यह कहते हुए उद्धृत किया है कि राहुल गांधी ने राज्य में अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए कड़ा स्टैंड लेने के बजाय अब्दुल्ला परिवार के साथ नेहरू-गांधी खानदान के पुराने संबंधों को अधिक तरजीह दी। यदि ऐसा है तो यह कोई दूरगामी सोच का परिचायक कदम नहीं।

जम्मू-कश्मीर राज्य की मौजूदा जटिलताओं को जानकारों का एक बड़ा वर्ग राहुल के प्रपितामह पंडित नेहरू और उमर के दादा शेख अब्दुल्ला की नजदीकियों की देन मानता है। पंडित नेहरू ने शेख को जम्मू कश्मीर की रियासत की कमान सौंपने की अपनी चाहत और राज्य के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह के प्रति निजि खुन्नस के कारण उस दौर में एक के बाद एक कई ऐसे निर्णय लिए जिनका खमियाजा देश आज तक भुगत रहा है।

राहुल गांधी के पास अतीत की भूलों को सुधारने के अवसर हैं। परंतु देश और व्यापक जनहित पर पारिवारिक संबंध और व्यक्तिगत अभिरूचियां यूं ही भारी पड़ती रहीं तो कुछ नहीं बदलेगा। गांठे खुलेंगी नहीं, मजबूत होती जाएंगी। नतीजतन कश्मीरी जन-मन व दिल्ली के शासन के बीच पुल बनाने की बातें ख्याली पुलाव बन कर रह जाएंगी।

राहुल गांधी के दौरे का सिर्फ घाटी तक सीमित रहना भी आलोचना का सबब बन रहा है। जम्मू वालों को लगता है कि दिल्ली जम्मू-कश्मीर को अब भी सिर्फ कश्मीर के रूप देखती है। लद्दाख और जम्मू उसे आज भी दिखाई नहीं देते। पीड़ तो इनकी भी समझी जानी चाहिए। विकास की प्यास तो यहां भी घाटी जितनी है और रिश्तों के पुल तो यहां भी बनाने ही होंगे। कहा जा सकता है कि राहुल अपनी यात्रा को इन इलाकों तक विस्तृत कर संकुचित नजरिए में बदलाव का संकेत भी दे सकते थे।

लेखक परिचय- वीरेंद्र सिंह चौहान वरिष्ठ पत्रकार व जम्मू कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।

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