कल आग लगी और आज फिर बारूद के ढेर पर चल दिये शिवाकासी के लोग

शिवाकासी किसी कंपनी का नाम नहीं है। यह एक छोटा सा शहर है, जिसे देश भर में लोग पटाखों के लिये जानते हैं। ये वो शहर है, जहां के लोग बारूद के ढेर पर जीवन व्यतीत करते हैं। हमारे और आपके घरों में दीवाली पर खुशियां घोलने वाले इन लोगों का जीवन कब अंधेरे में चला जाये, कुछ पता नहीं होता। इसी शिवाकासी में एक फैक्ट्री में आग लगी तो दिल को कहीं न कहीं चोट पहुंची। लगा कोई अपने थे, जो चले गये।
ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, बल्कि उन सभी लोगों को लगा होगा, जो शिवाकासी के नाम से पटाखे खरीदने जाते हैं। हमारे तमिल-वनइंडिया के संवाददाता के मुताबिक इस छोटे से शहर में 8000 से ज्यादा छोटी-बड़ी पटाखे बनाने वाली फैक्ट्रियां हैं, जहां करीबन 1 लाख कर्मचारी काम करते हैं। ये कर्मचारी सिर्फ व्यस्क लोग नहीं, बल्कि वो किशोरियां, जिनकी पढ़ाई छूट जाती है, वो बच्चे जो आगे पढ़ नहीं पाते हैं, वे लोग जिन्हें कहीं रोजगार नहीं मिलता है, वे यहां आकर काम करते हैं।
यहां की पटाखा फैक्ट्रियों के मालिक पैसे में खेलते हैं, जबकि कामगार दो वक्त की रोटी के लिये दिन रात पसीना बहाते हैं। हर साल दीवाली पर 1000 करोड़ रुपए के पटाखों की बिक्री होती है, जबकि दैनिक कामगारों को 50 से 100 रुपए प्रति दिन मिलता है। शिवाकासी की शाक्षरता दर 77 प्रतिशत है, जो कि राष्ट्रीय साक्षरता दर से अधिक है। यही कारण है कि यहां के मूल निवासी पटाखों की फेक्ट्रियों में काम करना कम पसंद करते हैं। इसी लिये फैक्ट्रियां शहर के बाहरी इलाकों में बसे गांवों से लोगों को ट्रकों में भर कर लाते हैं और काम कराने के बाद शाम को छोड़ देते हैं।
खास बात यह है कि पटाखे बनाने वाली इन फैक्ट्रियों का इंस्पेक्शन तो हर साल होता है, लेकिन ऐक्शन बहुत कम। अगर ऐक्शन ही हुआ होता तो ओम शिव फैक्ट्री में 52 लोगों की जाने नहीं जातीं। इस फैक्ट्री का इंस्पेक्शन मंगलवार को ही हुआ और उसका लाइसेंस अस्थाई रूप से रद कर दिया गया। अगर प्रशासन ने त्वरित ऐक्शन लेते हुए तुरंत फैक्ट्री बंद कर दी होती, तो शायद आज इन 52 लोगों के घरों में मातम नहीं छाया होता।
अगर इस शहर की काबीलियत की बात करें तो आपको इस बात से अंदाजा हो जायेगा, कि पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने शिवाकासी का उपनाम "कुट्टी जापान" यानी मिनी जापान रखा था। भारत के इस मिनी जापान में गुरुवार को हुए हादसे से वहां काम करने वाले लोग जितने आहत हैं, उससे कहीं ज्यादा मजबूर। यह मजबूरी ही है कि सुबह आग की खबर अखबारों में पढ़ने के बाद ये लोग फिर से उसी बारूद के ढेर पर चल दिये, जो दूसरों की दीवाली और इनके घर मातम को न्योता देता है।












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