भारतविरोधी तत्वों से पाक की करीबियों पर दिल्ली मौन क्यों?

अगस्त 2012 की एक शाम... इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग का प्रांगण। पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के साथ वार्ता के लिए भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा आज ही यहां पंहुचे हैं। वार्ता कल है। उच्चायोग ने कृष्णा के स्वागत में विशेष भोज आयोजित किया है।
भोज की मेज पर गिलगित-बाल्टिस्तान, बलूचिस्तान और सिंध से पधारे उन नेताओं को खीर परोसी जा रही है, जो अपने अपने इलाकों में पाकिस्तानी सरकार व फौज की ज्यादतियों और मानवाधिकार हनन की घटनाओं के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। इन इलाकों को पाकिस्तान से कैसे अलग किया जाए, इस पर सलाह-मशविरा जारी है।
भोज-वार्ता का यह काल्पनिक दृश्य क्या कभी हकीकत में बदल सकता है? इस सवाल का स्वाभाविक जवाब होगा - शायद कभी नहीं। ऐसा इसलिए चूंकि भारत दो देशों के बीच रिश्तों की संवेदनशीलता और कूटनीतिक शिष्टाचार की मर्यादा को समझता है। मगर पिछले साल इसी प्रकार की मंत्री-स्तरीय वार्ता के लिए दिल्ली पधारी पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने इस मर्यादा को ताक पर रख कर भारत के साथ कूटनीतिक दुर्व्यवहार किया था।
याद कीजिए पिछली जुलाई। पाकिस्तान की युवा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार अपनी कूटनीति के जलवे दिखाने भारत आई थीं। हमारे बुजुर्ग विदेश मंत्री एसएम कृष्णा को चमत्कृत करने से पहले वे दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में घाटी के अलगाववादी नेताओं से मिलने बैठ गईं थीं।
हुर्रियत के विभिन्न खेमों से ताल्लुक रखने वाले अपने जिन पाक-परस्त दोस्तों को सुश्री खार ने हमारे विदेश मंत्री के साथ मुलाकात से पहले दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास में दावत दी, उनकी असलियत भला किससे छिपी है? ये सरेआम भारत की संप्रभुता को चुनौती देते हैं।
श्रीनगर की गलियों में जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करने के नारे लगाते हैं। इतना ही नहीं,इनमें से अधिकांश अपने भारत-घाती राग की कीमत भी चोरी-छिपे हवाला के जरिए पाकिस्तानी आई.एस.आई. से वसूलते रहे हैं। यह बात भी सारी दुनिया जानती है।
कंपोजिट डायलॉग के क्रम में पाकिस्तानी मंत्री आई तो कृष्णा से मिलने थीं मगर उनसे मिलने से पहले वे भारत-विरोधी लोगों के इस छोटे से गिरोह से गिटपिट करने में मशगूल हो गईं थी। इस साल चूंकि यह मंत्री स्तरीय वार्ता इस्लामाबाद में होनी है, इसलिए इस प्रकार का कुकृत्य दिल्ली आ रहे पाकिस्तान के विदेश सचिव दोहराने जा रहे हैं।
खबर है कि जलील अब्बास जीलानी 4 व 5 जुलाई को दिल्ली में हमारे विदेश सचिव रंजन मथाई से बातचीत कर अगले माह होने वाली मंत्रियों की मुलाकात की आधारभूमि तैयार करेंगे। मगर पाकिस्तान के दिल्ली स्थित उच्चायोग ने 3 जुलाई को कश्मीर घाटी में सक्रिय अपने हिंदुस्थानी एजेंटों यानि अलगाववादी कश्मीरी नेताओं को मशविरे के बहाने दिल्ली बुला भेजा है।
उन्हें जलील जीलानी से भी मिलवाया जायेगा. हुर्रियत नेताओं मीरवायज उमर फारूक, यासीन मलिक और खुद को खुल्लेआम पाकिस्तानी बताने वाले सैयद अली शाह जीलानी को यह निमंत्रण पंहुच चुका है।
क्या पाकिस्तानी उच्चायोग की यह हरकत हमारी ही मांद में बैठकर हमें आंख दिखाने वाली नहीं है? क्या इस बार दिल्ली इस सुनियोजित अपमान को रोकने के लिए कोई कारगर पहलकदमी करेगी? या वह एक बार फिर खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचकर रह जाएगी। यदि इस बार पिछली जुलाई का इतिहास दोहराया गया तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि आखिर दिल्ली इतनी अशक्त व निशक्त क्यूं होती जा रही है?
पूछा यह भी जाएगा कि क्या इस्लाम और मुसलमानों के नाम पर कश्मीरी अलगाववादियों के लिए यूं घड़ियाली आंसू टपकाने वाले पाकिस्तान का बीजिंग स्थित उच्चायोग चीन में भी इसी प्रकार का व्यवहार करने की हिमाकत कर सकता है? कौन नहीं जानता कि चीन के एक मुस्लिम बहुल प्रांत में भी चीन से अलगाव का आंदोलन बरसों से चल रहा है। मगर पाकिस्तान ऐसा बीजिंग में तो क्या दुनिया में कहीं नहीं कर सकता। भारत में यह हो जाता है चूंकि हम अभद्रता और दुव्यर्वहार चुपचाप सह लेते हैं।
पिछले साल दिल्ली ने अगर पाकिस्तानी बिल्ली को कायदे से धिक्कार दिया होता तो बलूंगड़ों को पंख नहीं लगते। शायद ही पाकिस्तानी दूतावास इस बार यह हरकत दोहराता। पिछली बार हमने दबे सुर में अपनी नाराजगी जता कर पाकिस्तान को बता दिया था कि भारत की सहनशक्ति अपार है। बीते बरस जब हमारी सरकार दबी जुबान में बोल रही थी तब दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र का चौथा खंभा क्या कर रहा था, यह भी हमें याद करना चाहिए।
जब सुश्री खार भारत के लिए खार बोने में जुटी थी, उस दौरान हमारे मीडिया की कथित चौकस निगाहों और कैमरों का ध्यान युवा विदेश मंत्री के दमकते मुखमंडल पर अटक कर रह गया था। भारतीय प्रिंट और इलेक्टानिक मीडिया में केवल सुश्री खार के कपड़ों, पर्स और आभूषणों के ब्रांड व मूल्य पर खोजी और सरोकारपूर्ण रिपोर्टें प्रकट हो रही थीं।
शायदी इसी का परिणाम हैं घाटी में रोज भारत सरकार, भारतीय सेना और भारतीय संविधान को अपमानित करने और भारत से अलग होने की देशद्रोहपूर्ण रट लगाने वाले जीलानी और उनके जैसे दूसरे भारत-द्रोही फिर से दिल्ली आकर
पाकिस्तानी उच्चायोग में बिरयानी की दावत उड़ाने की तैयारी में जुटे हैं।
देखना यह है कि क्या भारत का विदेश मंत्रालय कार्यवाहक पाकिस्तानी उच्चायुक्त बाबर को तलब कर दो टूक शब्दों में अलगाववादियों के साथ प्रस्तावित तीन जुलाई की बातचीत रद्द करने के लिए कहेगा? क्या कृष्णा के कार्यालय से यह संदेश भेजा जाना जरूरी नहीं हो गया है कि पाक उच्चायोग में होने जा रहा भारत-विरोधी प्रीति-भोज स्थगित नहीं हुआ तो पाकिस्तान भी इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास में पाकिस्तान के आंतरिक शत्रुओं के खीर-समरोह का सामना करने के लिए तैयार रहे।
दिल्ली आने के लिए श्रंगार कर तैयार बैठे अलगाववादियों को घाटी में ही रोक देना इस स्थिति से निपटने का दूसरा उपाय हो सकता है। मगर इसका लाभ वे दुनिया के सामने रोना-पीटना करके उठाने की कोशिश करेंगे। हमारे विदेश मंत्रालय की बात पाक उच्चायोग न सुने तो इस सवाल पर विदेश सचिवों की वार्ता को ही क्यूं न टाल दिया जाए? विकल्प और भी होंगे मगर उनमें से किसी एक को चुनने और उसे अमल में लाने के लिए मजबूत राजनीतिक व कूटनीतिक संकल्प की आवश्कता होगी।
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