हड़प्पाकाल की धरोहर को ले गए खनन माफिया

खनन इसी प्रकार जारी रहा तो आने वाले दो माह में यह टीला मैदान का रूप धारण कर लेगा। इस बारे में न तो खनन विभाग का कोई ध्यान है और न ही पुरातत्व विभाग का। मंगलवार 24 अप्रैल को ली गई इस तस्वीर में सबकुछ उजड गया है। यहां नाले जैसी दिख रही इस जगह का इस्तेमाल खनन माफिया ट्रालियों में मिटटी भरने के लिए करते हैं। यहां पर 27 जनवरी से 5 फरवरी तक एमडीयू और जापानी शोधार्थियों ने किया था शोध। कल्टीवेटर और जेसीबी के इस्तेमाल के कारण हड़प्पा कालीन कच्चे मकानों के अंश गायब। मिताथल में पहली बार 1915 में मिले थे कुषाण युग और समुंद्रगुप्त कालीन 86 सोने के सिक्के। 23 सिक्के लोगों ने नष्ट कर दिए, बाकी लाहौर के म्यूजियम में अब भी सुरक्षित हैं। 1965 में मिले भी यहां तांबे के औजार मिले थे।
ये कहना है अधिकारियों का
सहायक माइनिंग अधिकारी आरएस ठाकरान का कहना है कि इस बारे में जानकारी नहीं है। जल्द ही इस बारे में अवैध माफिया को नोटिस जारी करेंगे। खनन नहीं रुका तो कार्रवाई की जाएगी। वहीं हरियाणा पुरातत्व विभाग एवं म्यूजियम के प्रभारी रणबीर शास्त्री ने कहा कि खनन को रोकने का जिम्मा धारा 158 के तहत भारतीय पुरातत्व विभाग का है। हम कुछ नहीं कर सकते। वहीं भारतीय पुरातत्व विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर जनरल, डॉ. बीआर मणि ने कहा कि पिछले साल तीन एजेंसियों को खुदाई की परमिशन दी थी। इनमें भारतीय पुरातत्व विभाग, डेकन विश्वविद्यालय और एमडीयू रोहतक। खनन रोकने की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की है। प्रशासन को ऐसी जगहों पर नजर रखनी चाहिए।












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