अपने सहयोगियों से दुखी हैं प्रणब दादा

Pranab Mukherjee
दिल्ली (ब्यूरो)। सरकार पर भले ही यह आरोप लगते रहे हों कि सरकार में निर्णय करने की क्षमता नहीं है पर इस बात से वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि वे कठोर निर्णय लेना तो चाहते हैं पर उनकी राह में सहयोगी ही बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं जिससे अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ पाती।

वाशिंगटन में एक बैठक के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि अर्थव्यवस्था जिस मुकाम पर है वहां कठोर निर्णय लेने ही होंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की योजना इस वर्ष के अंत तक पेंशन फंड नियमन विधेयक, बीमा संशोधन विधेयक एवं बैंकिंग संशोधन विधेयक को कानूनी जामा पहनाने की है। वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश अवश्य की है कि भारत सरकार आर्थिक सुधारों को लागू करने को लेकर पूरी तरह से गंभीर है।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि गठबंधन की राजनीति की वजह से कई अहम फैसले नहीं हो पाते हैं। वाशिंगटन में निवेशकों, अर्थविदों के साथ एक बैठक में वित्त मंत्री ने इस बात से साफ तौर पर इंकार किया कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले नहीं कर पा रही है। आम बजट 2012-13 में भी कई ऐसे प्रस्ताव हैं जो आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाने वाले हैं। इस संदर्भ में वित्त मंत्री ने पेंशन फंड विधेयक, बैंकिंग संशोधन विधेयक और बीमा संशोधन विधेयक का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार इन विधेयकों को इस सत्र में या संसद के आगामी सत्र में पारित करवाने की कोशिश करेगी।

बताते चलें कि इन तीनों विधेयकों को वित्तीय क्षेत्र में सुधार के लिए काफी अहम माना जा रहा है। लेकिन इनका विरोध विपक्षी पार्टियों से ज्यादा संप्रग के सहयोगी दल ही कर रहे हैं। प्रणब ने स्वीकार किया कि सहयोगी दलों की वजह से ही कई महत्वपूर्ण सुधार से संबंधित फैसलों की रफ्तार धीमी करनी पड़ी है। जानकारों का मानना है कि उक्त तीनों विधेयक के पारित होने से देशी एवं विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास काफी बढ़ सकता है।

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